बिहार में जब भी तेजाब कांड की चर्चा होती है, तो इससे जुड़ी दो घटनाओं को याद कर लोगों में सिहरन दौड़ जाती है। एक है भागलपुर का अंखफोड़वा कांड और दूसरा सिवान का तेजाब कांडा। भागलपुर में सजायाफ्ता कैदियों की आंखों में तेजाब डालकर उन्हें अंधा कर दिया गया था। इस कांड के बारे में आपको ‘बिहार के महाकांड’ की अगली कड़ी में बताएंगे। आज बात सीवान के तेजाबकांड की, जिसे न सिर्फ अपनी बर्बरता के लिए, बल्कि राजनीतिक शख्सियतों और बाहुबलियों के गठजोड़ का भद्दा चेहरा पेश करने के लिए जाना जाता है।
‘बिहार के महाकांड’ सीरीज की सातवीं कड़ी में हम जिस सीवान तेजाबकांड के बारे में बताने जा रहे हैं, उसे लेकर कई बातों के बारे में जानना जरूरी है। मसलन इस घटना के आगे-पीछे की कहानी क्या है? मामले से कौन-कौन से चेहरे जुड़े रहे थे? इस बर्बर घटना में हुआ क्या था? अदालत में यह मामला कैसे चला और पीड़ितों-आरोपियों का क्या हुआ? आइये जानते हैं पूरी कहानी…
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कैसे शुरू हुई तेजाबकांड की कहानी?
सीवान में चंदाबाबू की दो दुकानें थीं। एक मकान के नीचे और दूसरी बस स्टैंड के पास। बात 16 अगस्त 2004 की है। चंदाबाबू पटना में थे। उसी दिन सिवान में कुछ लोग चंदाबाबू के बेटे के पास पहुंचे और दो लाख रुपये देने की मांग करने लगे। हालांकि, घर पर मौजूद बेटों ने कहा कि उनके पास पैसा नहीं है। जब पिताजी आएंगे तब बात करेंगे। रंगदारी की मांग करने आए गुंडे नहीं माने। बात इतनी बढ़ी कि नौबत मारपीट तक आ गई। मारपीट के बाद रंगदारी मांगने आए लोगों ने चंदाबाबू के दो बेटे- राजीव और गिरीश को घर से उठा लिया। इसके बाद उनके तीसरे बेटे सतीश को दूसरी दुकान से उठा लिया गया।
ये सब किसके इशारे पर हुआ?
रंगदारी की मांग करने आए ये लोग बहुबली नेता शहाबुद्दीन के गुर्गे थे। दावा किया जाता है कि शहाबुद्दीन की तरफ से चंदाबाबू के घर पर फोन किया गया और कहा फिर से रंगदारी की मांग की गई। चंदाबाबू के बेटों को उठाने के बाद सभी को शहाबुद्दीन के गांव प्रतापपुर लाया गया। चंदाबाबू ने कई टीवी इंटरव्यू में बताया है कि उनके घर में नीचे की दुकान के उद्घाटन में शहाबुद्दीन और बिहार सरकार में तत्कालीन मंत्री अवध बिहारी चौधरी आए थे। तभी से शहाबुद्दीन की निगाह उनके घर पर थी। इसी के लिए उसने हमारे दो लड़कों का अपहरण कर के मार दिया।
हालांकि, मामले का दूसरा पहलू भी है। कोर्ट में जमा हुए दस्तावेजों के मुताबिक, चंदाबाबू ने बस स्टैंड के पास कुछ जमीन खरीदी थी, जिसमें दुकानें भी थीं। इस दुकान पर नागेंद्र तिवारी नाम के एक शख्स का कब्जा था, जो इसे खाली नहीं करना चाहता था। मामला सिविल कोर्ट में चला गया। इसके बाद नागेंद्र ने शहाबुद्दीन के करीबी दो लोगों को रख लिया। इसके बाद जब चंदाबाबू ने दुकान खाली कराने की कोशिश की, तो स्थिति बिगड़ गई और मामला पीड़ितों के साथ मारपीट के अलावा दुकान में तोड़फोड़, आगजनी तक पहुंची और बढ़ते-बढ़ते तेजाब और तेजाबकांड तक पहुंच गई।
रंगदारी और मारपीट में ऐसे हुई तेजाब की एंट्री
चंदाबाबू का दावा करते थे कि शहाबुद्दीन के लोग उनकी दुकान में घुसे वहां रखे ढाई लाख रुपये हड़प लिए। उनके बेटों- सतीश और राजीव से मारपीट की। इस दौरान बड़ा बेटा राजीव वहां से भागा और बाथरूम से तेजाब की बोतल उठा लाया। उसने शहाबुद्दीन के लोगों पर यही तेजाब फेंक दिया और बाइक से बाहर भागे। कुछ दूर पर उनके बेटे की बाइक में शहाबुद्दीन के गुर्गों ने टक्कर मार दी और उनका अपहरण कर लिया। इसके अलावा कुछ लोग चंदाबाबू के घर में घुसे और उनके बेटे गिरीश को भी उठा लिया। इसके बाद उनके तीसरे बेटे सतीश को दूसरी दुकान से उठा लिया गया।
सभी को प्रतापपुर लाया गया। उसी रात शहाबुद्दीन भी जेल से प्रतापपुर गया। यहां चंदाबाबू को दो बेटों सतीश और गिरीश को तेजाब मंगाकर उससे नहलवाया गया। इसके बाद दोनों के टुकड़े-टुकड़े कर दिए गए। इन टुकड़ों पर नमक डलवा के बोरे में कस कर बंद करवा दिया गया। शहाबुद्दीन ने उनके बड़े लड़के के सामने ही इस पूरी घटना को अंजाम दिया। चंदाबाबू का दावा था कि शहाबुद्दीन उन्हें और उनके बड़े बेटे को भी उसी समय मारने की फिराक में था। हालांकि, घटना की रात उनका बेटा रात में बाथरूम के बहाने बाहर आया और मकई के खेतों से भाग निकला।
छह महीने तक पता ही नहीं चला कि एक बेटा जिंदा है
घटना के वक्त पटना में मौजूद चंदाबाबू ने एक अखबार के जरिए इसका पता चला। अपना नाम देखने के बाद उन्होंने घर पर फोन किया, तो फोन नहीं उठा। पड़ोसियों ने भी फोन नहीं उठाया। उनके परिचित लोगों ने उन्हें सीवान जाने से रोका और कहा कि अगर आप वहां गए तो आपको भी मार दिया जाएगा। एक इंटरव्यू में चंदाबाबू बताया था कि उनको अपने बड़े बेटे के जिंदा होने की बात पांच-छह महीने बाद पता चली। उस बेटे को भी अपने परिवार के बारे में कोई जानकारी नहीं पता चली थी।
दर-दर भटके मदद नहीं मिली
हर ओर से बंद हो रहे दरवाजों के बीच उन्हें सहारा कांग्रेस के रविंद्र मिश्र से मिला। उन्होंने चंदाबाबू को कई दिनों तक पटना स्थित अपने घर में रखा। इसके बाद चंदाबाबू बिहार के डीआईजी से मिले, जिन्होंने एसपी से सुरक्षा मुहैया कराने के लिए कहा। इस तरह कई महीनों बाद चंदाबाबू की सीवान वापसी तय हो पाई। उनका बेटा राजीव भी बाद में घर आ गया। इसके बाद शुरू हुई कानूनी लड़ाई। जो 14 साल के संघर्ष और बड़े बेटे राजीव को खोने के बाद अंजाम तक पहुंची।
Bureau Report
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