बिहार: बिहार में इन दिनों मतदाता सूची को अपडेट करने की प्रक्रिया चल रही है, जो किसी भी लोकतांत्रिक देश की आधारशिला होती है। लेकिन यह दुर्भाग्यपूर्ण है कि इस बार यह प्रक्रिया आम मतदाता के लिए एक सहज अधिकार न होकर एक जटिल परीक्षा बनती जा रही है। चुनाव आयोग द्वारा लागू की गई शर्तें न केवल हैरान करने वाली हैं, बल्कि आम और गरीब नागरिकों के लिए यह प्रक्रिया और भी मुश्किल बना रही हैं।
अगर चुनाव आयोग की मंशा सचमुच साफ और लोकतंत्र के हित में है, तो सवाल उठता है कि फिर ऐसी कड़ी और अनावश्यक शर्तें क्यों थोप दी गईं हैं, जो एक साधारण नागरिक के लिए पूरी कर पाना बेहद कठिन है? मतदाता बनने की प्रक्रिया को जितना सरल और पारदर्शी होना चाहिए, उतनी ही यह अब उलझनों और आशंकाओं से भरी नजर आ रही है।
साफ़ है कि यह प्रक्रिया मतदाताओं को जोड़ने से अधिक, उन्हें छांटने और दूर करने का माध्यम बनती जा रही है। गांव-देहात में रहने वाले गरीब, निरक्षर और सीमित संसाधनों वाले नागरिक इस पूरी व्यवस्था के सबसे बड़े पीड़ित हैं। जिनके पास कागज पूरे न हों, या जो तकनीकी प्रक्रिया न समझ पाएं — उनके मताधिकार को क्या यूं ही छीना जा सकता है?
यह समय है जब या तो स्वयं चुनाव आयोग इस पर गंभीरता से पुनर्विचार करे, या फिर सुप्रीम कोर्ट को स्वयं संज्ञान लेकर हस्तक्षेप करना चाहिए। लोकतंत्र में चुनाव सिर्फ प्रक्रिया नहीं, बल्कि विश्वास का प्रतीक है — और जब इस प्रक्रिया में ही भेदभाव या जटिलता की बू आने लगे, तो वह विश्वास टूटने लगता है।
अब उम्मीद की जा रही है कि इस गंभीर मुद्दे पर सुप्रीम कोर्ट खुद संज्ञान ले और चुनाव आयोग को सख्ती से संवैधानिक दायित्वों की याद दिलाए, या फिर खुद आयोग इस पर विचार कर प्रक्रिया को सरल बनाए और हर मतदाता तक उसका हक पहुंचाए
लोकतंत्र के मूल सिद्धांतों के तहत हर नागरिक को वोट देने का अधिकार सहज और बाधारहित होना चाहिए। लेकिन वर्तमान स्थिति में यह अधिकार कई लोगों के लिए मात्र एक सपने जैसा लग रहा है।
एक सशक्त लोकतंत्र वही होता है जहाँ हर नागरिक की आवाज़ समान रूप से सुनी जाए — चाहे वह शहर का पढ़ा-लिखा हो या गांव का मजदूर। वोट देना अधिकार नहीं, जिम्मेदारी है — और यह जिम्मेदारी तभी निभाई जा सकती है जब नागरिक को अधिकार सुलभ और सुरक्षित रूप से दिया जाए।
Bureau Report
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