रूस-यूक्रेन की जंग हो या इजरायल-गाजा के बीच की लड़ाई, ऐसे हालात कभी नहीं बने जो ईरान- अमेरिका/ इजरायल के बीच युद्ध की वजह से पैदा हो गए हैं. मिडिल ईस्ट वॉर ने पूरी दुनिया को अपनी गिरफ्त में ले लिया है. कच्चे तेल की कीमत आसमान छूने लगे हैं, शेयर बाजार क्रैश हो रहा है, ग्लोबल सप्लाई चेन टूट जाने से खाद से लेकर खाद्य तक की परेशानी हो रही है. स्थिति ऐसी बन गई है कि अगर जंग जल्दी खत्म नहीं हुआ तो दुनिया के कई देशों में भूखमरी की समस्या खड़ी हो जाएगी. युद्ध में अरबों रुपये झोंके जा चुके हैं, लेकिन इस युद्ध से सबसे बड़ा फायदा रूस को हुआ है. युद्ध की वजह से रूस का खजाना भर रहा है, जबकि चीन को इस युद्ध से सबसे बड़ा नुकसान झेलना पड़ रहा है.
रूस को युद्ध से सबसे बड़ा फायदा
मिडिल ईस्ट जंग और स्ट्रेट ऑफ होर्मुज बंद होने की वजह से ग्लोबल मार्केट में तेल और गैस की कीमत आसमान छू रही है. कच्चे तेल की कीमत 110 डॉलर प्रति बैरल को पार कर चुकी है. स्ट्रेट ऑफ होर्मुज पर ईरान की पाबंदी के बाद रूस के तेल की डिमांड बढ़ गई है. जिस अमेरिका ने रूस के तेल निर्यात पर प्रतिबंध लगाया था, वही अब भारत से रूसी तेल खरीदने की बात कह रहा है. बता दें कि यूक्रेन युद्ध के बाद अमेरिका समेत पश्चिमी देशों ने रूस के तेल निर्यात पर प्रतिबंध लगा दिया था. पश्चिमी प्रतिबंध की वजह से रूस अपने तेल पर भारी डिस्काउंट ऑफर कर रहा था. भारत और चीन जैसे देश इस डिस्काउंट का पूरा फायदा उठाकर रूस से सस्ता तेल खरीद रहे थे. बाद में अमेरिका ने रूसी तेल की खरीद के चलते भारत पर 25 फीसदी टैरिफ लगा दिया था. जिस रूसी तेल पर अमेरिका और यूक्रेन जंग की वजह से प्रतिबंध लगा था, अब ईरान की जंग ने उसकी डिमांड बढ़ा दी है. ग्लोबल ऑयल सप्लाई को बचाने के लिए अमेरिका ने भी रूसी तेल की खरीद-ब्रिकी से पाबंदी हटा ली है.
ईरान जंग से बढ़ी रूस की कमाई
रूस भी मौका का भरपूर फायदा उठा रहा है. रूस ने अपने तेल पर दिए जाने वाले डिस्काउंट को कम कर दिया है. 28 फरवरी से पहले रूसी तेलों पर 10 से 13 डॉलर प्रति बैरल का डिस्काउंट मिल रहा था, जिसे अब घटाकर सिर्फ 4 से 5 डॉलर कर दिया गया है. भारतीय तेल कंपनी HPCL ने फरवरी में रूसी तेल के दो कार्गो को 13 डॉलर की छूट पर खरीदा था, लेकिन अब ये डिस्काउंट भारतीय रिफाइनरियों को नहीं मिलेगा. ये सिर्फ भारत के साथ नहीं बल्कि बाकी देशों के साथ भी है. यानी इस युद्ध से रूस का सरकारी खजाना भरेगा. रूसी तेल की डिमांड बढ़ रही है. सिर्फ भारत ही नहीं यूरोपीय देश भी रूसी तेल की ओर रूख कर रहे हैं.
ईरान युद्ध में चीन बना सबसे बड़ा लूजर
मिडिल ईस्ट युद्ध की वजह से सबसे बड़ा झटका चीन को लगा है. चीन ईरान के तेल का सबसे बड़ा खरीदार था और भारी भरकम छूट पर कच्चा तेल खरीद रहा था. ईरान के 90 फीसदी तेल चीन पहुंचते थे, लेकिन जंग के बाद उसके लिए तेल का ये स्त्रोत फिलहाल बंद हो गया है. ईरान से सस्ता तेल ही सिर्फ नहीं बंद हुआ, बल्कि 400 अरब डॉलर भी फंस गए हैं. बीते कुछ दशक से चीन अमेरिका के दुश्मन देशों के साथ दोस्ती बढ़ा रहा है. इसी कड़ी में उसने ईरान में भारी भरकम निवेश भी किया है. ईरान चीन के लिए एक बड़ा रणनीति केन्द्र रहा है. मार्च 2021 में चीन और ईरान ने बड़ी पार्टनरशिप साइन की थी. चीन ने ईरान में बेल्ट एंड रोड इनिशिएटिव के तहत इंफ्रास्ट्रक्चर और एनर्जी इन्वेस्टमेंट में 400 अरब डॉलर के निवेश का वादा किया है, लेकिन अमेरिका के हमले से चीन का पूरा प्लान चौपट हो गया है. तेल और निवेश दोनों चीन के हाथ से निकल चुके हैं.
चीन पर ईरान-अमेरिका जंग का वार
अमेरिका और ईरान की जंग का असर चीन की अर्थव्यवस्था पर दिखने लगा है. कच्चे तेल के दाम बढ़ने से दुनिया के सबसे बड़े तेल आयातकों में से एक चीन पर महंगाई का बम फूटा है. फरवरी में चीन का कंज्यूमर प्राइस इंडेक्स (CPI) 1.3% पर पहुंच गया, जो बीते 3 साल में सबसे हाई पर है. चीन में महंगाई बढ़ोतरी की सबसे बड़ी वजह तेल की कीमतों में तेजी है. तेल के लिए चीन का आयात बिल बढ़ने से खजाने पर दवाब बढ़ रहा है.
Bureau Report
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