राज्यसभा चुनाव 2026: हरिवंश बाबू की ‘साइलेंट वफादारी’ का इनाम देगी BJP, क्या पूर्व CJI रंजन गोगोई की जगह मिलेगा मौका?

राज्यसभा चुनाव 2026: हरिवंश बाबू की 'साइलेंट वफादारी' का इनाम देगी BJP, क्या पूर्व CJI रंजन गोगोई की जगह मिलेगा मौका?

Harivansh Narayan Singh Latest News: राज्यसभा चुनाव को लेकर बिहार का सियासी पारा चढ़ा हुआ है. जेडीयू की ओर से मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने खुद राज्यसभा जाने का फैसला लेकर सभी को चौंका दिया. इसके साथ ही केंद्रीय मंत्री रामनाथ ठाकुर को तीसरा टर्म देकर पार्टी की परंपरा को भी बदल डाला. इसी के साथ राज्यसभा के उपसभापति हरिवंश नारायण सिंह के सियासी करियर पर संकट मंडराने लगा है. हरिवंश बाबू का कार्यकाल 9 अप्रैल को समाप्त हो रहा है और उन्हें पार्टी ने रिपीट नहीं किया है. इससे अब उपसभापति पद पर भी चुनाव के आसार नजर आ रहे हैं. इस सबके बीच चर्चा यह भी है कि बीजेपी उन्हें (हरिवंश नारायण सिंह) को उनकी ‘साइलेंट वफादारी’ का इनाम दे सकती है. 

सियासी जानकारों के मुताबिक, नीतीश कुमार जब बीजेपी से अलग हुए थे, तब हरिवंश बाबू ने जेडीयू अध्यक्ष के विपरीत जाकर हमेशा मोदी सरकार का समर्थन किया. नीतीश कुमार के एनडीए छोड़ने के बाद भी हरिवंश नारायण सिंह ने राज्यसभा के उपसभापति का पद नहीं छोड़ा था. याद कीजिए 28 मई 2023 का दिन, जब नए संसद भवन का उद्घाटन होने वाला था और सभी विपक्षी दलों ने इस कार्यक्रम का बहिष्कार का ऐलान किया था. जेडीयू ने भी इस कार्यक्रम में शामिल नहीं होने का ऐलान किया था. इसके बावजूद राज्यसभा के उपसभापति हरिवंश नारायण सिंह इस कार्यक्रम में पहुंचे थे. इतना ही नहीं उन्होंने राष्ट्रपति का संदेश भी पढ़कर सुनाया था. इस घटना पर जेडीयू सांसद ललन सिंह काफी नाराज हुए थे और हरिवंश बाबू के लिए काफी कड़वे शब्दों का इस्तेमाल किया था.

हरिवंश नारायण सिंह ने ललन सिंह के बयान पर कोई प्रतिक्रिया नहीं दी थी, लेकिन मुख्यमंत्री से मिलकर अपनी सफाई दी और सीएम को संतुष्ट करने में कामयाब भी हुए थे. दिल्ली के राजनीतिक गलियारों में माना जाता है कि हरिवंश बाबू ही पीएम मोदी और मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के बीच एक सेतु का काम करते थे. उनके ही जरिए नीतीश कुमार की फिर से एनडीए में वापसी संभव हो सकी थी और लोकसभा चुनावों में बीजेपी को इसका फायदा भी मिला. नीतीश कुमार के साथ आने से ही आज केंद्र में बीजेपी की सरकार है. 

सियासी गलियारों में चर्चा है कि हरिवंश बाबू को जैसे वरिष्ठ और अनुभवी व्यक्तित्व को बीजेपी आलाकमान ऐसे ही हाथ से नहीं जाने देगा. हरिवंश बाबू के रिटायरमेंट से केंद्र सरकार को उपसभापति का चुनाव भी कराना पड़ेगा. यूजीसी नियमों के कारण यह भरोसा नहीं है कि सरकार अपने ही सदस्यों का समर्थन हासिल कर सकेगा या नहीं. इन परिस्थितियों में सरकार इतना बड़ा खतरा नहीं ले सकती है. ऐसे में भाजपा के पास हरिवंश नारायण सिंह को बनाए रखने के लिए 3 विकल्प हैं:  

1. मनोनयन के माध्यम से राज्यसभा में बने रहें: अप्रैल में जहां चुने हुए 37 सदस्य राज्यसभा से रिटायर हो रहे हैं, वहीं मनोनीत कोटे से भी कुछ सदस्यों का कार्यकाल पूरा हो रहा है. ऐसे में हरिवंश को राष्ट्रपति कोटे से राज्यसभा में फिर से लाया जा सकता है. आगे चलकर वे उपराष्ट्रपति पद के भी प्रबल दावेदार हो सकते हैं. हालांकि भारतीय जनता पार्टी सहयोगी दलों के खाते में यह पद नहीं जाने देती.

2. राजभवन का तोहफा: हरिवंश नारायण सिंह के बेदाग राजनीतिक ​करियर, पत्रकारिता और जेपी आंदोलन में उनके योगदान को देखते हुए मोदी सरकार किसी बड़े राज्य का राज्यपाल भी नियुक्त कर सकती है. 

3. आयोग के अध्यक्ष: हरिवंश के राजनीतिक कद और उनके अनुभव को देखते हुए उन्हें किसी महत्वपूर्ण राष्ट्रीय आयोग या परिषद का अध्यक्ष भी बनाया जा सकता है. इस तरह उनके अनुभव का लाभ लिया जा सकता है. 

Bureau Report

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