Parliament Session 2026: ओम बिरला के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव, क्या है प्रक्रिया; स्पीकर के खिलाफ कब-कब आया ये प्रस्ताव?

Parliament Session 2026: ओम बिरला के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव, क्या है प्रक्रिया; स्पीकर के खिलाफ कब-कब आया ये प्रस्ताव?

लोकसभा के बजट सत्र का दूसरा चरण आज से शुरू हो रहा है और इसके साथ ही संसद के भीतर सियासी हलचल भी तेज हो गई है. इस बार विपक्ष ने लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला को पद से हटाने के लिए प्रस्ताव का नोटिस दिया है, जिस वजह से यह मुद्दा चर्चा का केंद्र बन गया है. दरअसल, विपक्षी दलों ने स्पीकर के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव लाने की पहल की है. इसके बाद कई सवाल उठने लगे हैं? क्या इससे पहले भी किसी लोकसभा स्पीकर के खिलाफ ऐसा प्रस्ताव आया है?, इसे लाने की प्रक्रिया क्या होती है? और इस बार नोटिस देते समय विपक्ष से आखिर कौन-सी बड़ी चूक हो गई?

संविधान और लोकसभा के नियमों के अनुसार, अगर किसी सांसद को लगता है कि स्पीकर को पद से हटाया जाना चाहिए, तो वह इसके लिए प्रस्ताव का नोटिस दे सकता है. इस प्रस्ताव को आगे बढ़ाने के लिए कम से कम 14 दिन पहले नोटिस देना जरूरी होता है. इसके बाद सदन में इस पर चर्चा कराई जा सकती है और मतदान के जरिए फैसला होता है कि स्पीकर अपने पद पर बने रहेंगे या नहीं. हालांकि, इस बार विपक्ष के नोटिस को लेकर तकनीकी सवाल भी उठ रहे हैं. बताया जा रहा है कि नोटिस देने की प्रक्रिया और नियमों के पालन को लेकर विपक्ष से कुछ अहम चूक हो गई, जिसे लेकर सत्ता पक्ष सवाल खड़े कर रहा है.

कैसे लाया जाता है स्पीकर को हटाने का अविश्वास प्रस्ताव?

स्पीकर के खिलाफ प्रस्ताव लाने के लिए एक निश्चित प्रक्रिया तय है. सबसे पहले कम से कम 14 दिन पहले लिखित नोटिस देना अनिवार्य होता है. इस नोटिस पर कम से कम 50 सांसदों के हस्ताक्षर होने चाहिए. नोटिस मिलने के बाद जब सदन में इस प्रस्ताव को पेश किया जाता है तो चेयर पूछता है कि कितने सदस्य इसके समर्थन में हैं. यदि उस समय कम से कम 50 सांसद खड़े हो जाते हैं, तो प्रस्ताव को स्वीकार कर लिया जाता है और उस पर चर्चा शुरू होती है. इसके बाद मतदान की प्रक्रिया होती है.

स्पीकर के खिलाफ प्रस्ताव पास होने के लिए कितने वोटों की जरूरत?

लोकसभा में स्पीकर को पद से हटाने की प्रक्रिया उतनी जटिल नहीं होती जितना अक्सर समझा जाता है. इसके लिए किसी विशेष बहुमत की जरूरत नहीं पड़ती, बल्कि साधारण बहुमत ही पर्याप्त होता है. साधारण बहुमत का मतलब यह है कि उस समय सदन में जितने सांसद मौजूद हों और मतदान कर रहे हों, उनमें से आधे से एक अधिक सांसद प्रस्ताव के पक्ष में हों. यदि ऐसा होता है तो स्पीकर को हटाने का प्रस्ताव पारित माना जाता है. जैसे हमारी लोकसभा में कुल 545 सीटें हैं ऐसे में अगर 500 सांसद सदन में मौजूद हैं तो उनमें से आधे से अधिक वोट जिसका होगा वही फैसला स्वीकार कर लिया जाएगा. अगर स्पीकर के खिलाफ लाए गए अविश्वास प्रस्ताव के लिए 500 में से 251 सांसदों का समर्थन मिल जाता है तो ये प्रस्ताव पारित हो सकता है. 

कब-कब आया है स्पीकर के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव?

साल 1947 में देश को मिली आजादी के बाद से भारतीय संसद में लोकसभा स्पीकर के खिलाफ अविश्वास या उन्हें पद से हटाने का प्रस्ताव बेहद दुर्लभ रहा है. 1947 के बाद अब तक केवल तीन मौकों पर ही विपक्ष ने ऐसा कदम उठाया था. यह प्रस्ताव क्रमशः जी. वी. मावलंकर, सरदार हुकुम सिंह और बलराम जाखड़ के खिलाफ लाए गए थे. हालांकि, एक भी बार विपक्ष को इसमें कामयाबी नहीं मिली और ये प्रस्ताव पारित नहीं हो सके. अब मौजूदा प्रस्ताव को शामिल कर लिया जाए तो आजादी के बाद यह चौथी बार है जब लोकसभा स्पीकर के खिलाफ इस तरह का प्रस्ताव सामने आया है.

कहां हुई विपक्ष से चूक?

भारत की संसदीय परंपरा में लोकसभा स्पीकर को सदन की निष्पक्षता और अनुशासन का प्रतीक माना जाता है, इसलिए उनके खिलाफ प्रस्ताव लाना हमेशा एक बड़ी राजनीतिक घटना माना जाता है. दिलचस्प बात यह है कि इस प्रस्ताव के साथ एक नया विवाद भी जुड़ गया है. विपक्ष की ओर से दिए गए नोटिस में कुछ तकनीकी और प्रक्रियागत गलतियां सामने आई हैं. जानकारी के मुताबिक, दस्तावेज में जहां 2026 लिखा जाना चाहिए था, वहां कई जगह 2025 दर्ज कर दिया गया. संसदीय मामलों के जानकारों का कहना है कि इतने महत्वपूर्ण प्रस्ताव में इस तरह की चूक विपक्ष की रणनीति और तैयारी पर सवाल खड़े करती है. उनका मानना है कि ऐसे संवेदनशील और गंभीर मामलों में दस्तावेजी सटीकता बेहद जरूरी होती है, क्योंकि छोटी सी गलती भी राजनीतिक बहस का मुद्दा बन सकती है.

Bureau Report

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