सुप्रीम कोर्ट ने अपने एक अहम फैसले में धर्मांतरण करने वाले शख्स के लिए एससी-एसटी एक्ट के तरह संरक्षण के दावे पर स्थिति साफ कर दी है. SC ने कहा है कि अगर कोई व्यक्ति अनुसूचित जाति (SC) समुदाय का है और धर्म बदलकर ईसाई हो जाता है, तो उसका अनुसूचित जाति का दर्जा खत्म हो जाता है. इसके बाद, वह SC/ST एक्ट (यानी अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति (अत्याचार निवारण) अधिनियम) के तहत संरक्षण का दावा नहीं कर सकता है. कोर्ट ने साफ कहा कि संविधान (अनुसूचित जाति) आदेश, 1950 में दी गई व्यवस्था के मुताबिक केवल हिंदू, सिख और बौद्ध धर्म के दलित समुदायों को अनुसूचित जाति का दर्जा प्राप्त है.
कोर्ट ने कहा कि इनके अलावा, अगर कोई दूसरा धर्म (ईसाई या मुस्लिम धर्म) अपना लेता है तो, उनका यह दर्जा समाप्त हो जाता है. 10 साल से ईसाई धर्म का पालन कर रहे चिंतादा ने कुछ लोगों पर हमला करने और जातिसूचक गाली देने का आरोप लगाते हुए SC/ST एक्ट के तहत मुकदमा दर्ज कराया था. इसके खिलाफ आरोपियों ने आंध्र प्रदेश हाई कोर्ट का रुख किया.
चिंतादा 10 साल से पादरी तो SC/ST एक्ट कैसे?
आरोपियों ने दलील दी कि चिंतादा ईसाई धर्म अपना चुके हैं और 10 साल से पादरी के तौर पर काम कर रहे हैं. ऐसे में, संविधान में दी गई व्यवस्था मुताबिक वह अनुसूचित जाति के नहीं माने जा सकते. हाई कोर्ट ने आरोपियों की दलील से सहमति जताते हुए इस केस को रद्द कर दिया.
आंध्र प्रदेश के गुंटूर जिले के रहने वाले चिंतादा पहले हिंदू थे और बाद में ईसाई बन गए. हालांकि इस आदेश को उन्होंने सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी. अब SC ने हाई कोर्ट के आदेश को बरकरार रखा है.
आरक्षण का मामला अब भी पेंडिंग
वैसे, सुप्रीम कोर्ट में यह मामला अलग से भी पेंडिंग है कि क्या धर्म परिवर्तन कर ईसाई और मुस्लिम बने सभी दलितों को अनुसूचित जाति के दर्जे और उसके मुताबिक मिलने वाले आरक्षण का लाभ दिया जा सकता है या नहीं. अभी सिर्फ हिंदू, सिख और बौद्ध धर्म के दलितों को अनुसूचित जाति का दर्जा और उसके मुताबिक आरक्षण का लाभ मिलता है, लेकिन इस्लाम और ईसाई धर्म अपनाने वाले दलितों को ये दर्जा हासिल नहीं होता है. सुप्रीम कोर्ट में दायर याचिकाओं में धर्म परिवर्तन कर इस्लाम और ईसाई धर्म अपनाने वाले दलितों को अनुसूचित जाति और संबंधित लाभ देने की मांग की गई है.
वहीं, केंद्र सरकार सुप्रीम कोर्ट में कह चुकी है कि वह इस मसले को लेकर रंगनाथ मिश्रा कमीशन की रिपोर्ट को स्वीकार नहीं कर रही है. साल 2007 में रंगनाथ कमीशन ने सभी धर्मों के दलितों को शैक्षणिक संस्थानों और सरकारी नौकरियों में अनुसूचित जाति को मिलने वाले आरक्षण का फायदा दिए जाने की सिफारिश की थी. सरकार का कहना है कि रंगनाथ कमीशन ने बिना जमीनी हकीकत का अध्ययन किए धर्मांतरण करने वाले सभी दलितों को आरक्षण का फायदा देने की सिफारिश की थी. उसने इस मसले पर विचार के लिए पूर्व चीफ जस्टिस के जी बालकृष्णन की अध्यक्षता में एक नए आयोग का गठन किया है.
Bureau Report
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