ऑल इंडिया मजलिस-ए-इत्तेहादुल मुस्लिमीन के प्रमुख असदुद्दीन ओवैसी ने बुधवार (20 मई) को केंद्रीय अल्पसंख्यक मामलों के मंत्री किरण रिजिजू पर तीखा हमला बोला. उन्होंने रिजिजू पर भारत की मुस्लिम आबादी के मौलिक अधिकारों से उन्हें व्यवस्थित रूप से वंचित करने के लिए “दुष्प्रचार” फैलाने का आरोप लगाया.
इस ताज़ा विवाद की वजह रिजिजू की एक कथित टिप्पणी थी, जिसमें उन्होंने मुसलमानों के अल्पसंख्यक दर्जे की तुलना पारसी समुदाय से की थी. उन्होंने कहा था कि भारत की मुस्लिम आबादी इतनी बड़ी है कि उससे दुनिया का छठा सबसे बड़ा देश बन सकता है, जबकि पारसियों की संख्या केवल लगभग 53,000 है.
सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स (पहले ट्विटर) पर तीखी प्रतिक्रिया देते हुए, ओवैसी ने रिजिजू को “अल्पसंख्यकों के खिलाफ मंत्री” करार दिया और जनसांख्यिकीय वर्गीकरणों के बारे में उनकी समझ पर सवाल उठाया. उन्होंने तर्क दिया कि भारतीय संविधान के अनुच्छेद 30 के तहत—जो अल्पसंख्यकों को शैक्षणिक संस्थानों की स्थापना और प्रशासन का अधिकार देता है—किसी भी हिंदू-बहुल राष्ट्र में कोई भी गैर-हिंदू समूह कानूनी रूप से एक अल्पसंख्यक होता है.
ओवैसी ने लिखा, “किरण रिजिजू के लिए एक आसान गणित का सवाल: क्या बड़ा है? 79.8% या 14%?” उन्होंने आगे कहा, “यदि हिंदू बहुसंख्यक समुदाय हैं, तो हर गैर-हिंदू समूह एक अल्पसंख्यक समुदाय है. मंत्री मुसलमानों को उनके मौलिक अधिकारों से वंचित करने के लिए दुष्प्रचार कर रहे हैं.”
ओवैसी ने मंत्री के तर्क को चुनौती देने के लिए क्षेत्रीय भाषाई संदर्भ का उदाहरण दिया. उन्होंने कहा कि यदि केवल आबादी के आकार के आधार पर किसी समूह को अल्पसंख्यक दर्जे से वंचित किया जाता है, तो गैर-हिंदी भाषी राज्यों में रहने वाले हिंदी बोलने वालों को अब भाषाई अल्पसंख्यक नहीं माना जा सकता—भले ही उनकी संख्या संयुक्त राज्य अमेरिका और कनाडा की कुल आबादी से कहीं अधिक हो. यह टकराव ओवैसी द्वारा इस महीने की शुरुआत में महाराष्ट्र के छत्रपति संभाजीनगर में आयोजित एक प्रेस कॉन्फ्रेंस के बाद सामने आया है, जहाँ उन्होंने स्थानीय मतदाता सूची के सत्यापन को लेकर गंभीर चिंताएँ जताई थीं.
Bureau Report
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