असली दिखने वाले चेहरों से लेकर कुदरत के शानदार नजारों को शरीर पर हूबहू छाप देने वाला टैटू मार्केट ने सरकार की चिंता बढ़ा दी है. टैटू का चलन बढ़ा तो चिंताएं भी बढ़ीं. कई रिपोर्ट्स में टैटू बनवाने में कदम-कदम पर खतरा होने की पुष्टि हुई है. देशभर में टैटू पार्लरों की संख्या बेहिसाब बढ़ी तो उनके काम करने के तरीके पर सवाल खड़े हुए. इस बीच कर्नाटक के स्वास्थ्य विभाग ने केंद्र सरकार को एक रिपोर्ट भेजकर देशभर में एक समान कड़े कानून लागू करने की मांग की है.
ट्रेंड और रेगुलेशन
टैटू, आर्ट का बेहतरीन रूप है, लोग सदियों से धार्मिक और रस्म-रिवाजों के लिए अपने शरीर को सजाते आए हैं. बेबी बूमर्स से लेकर जेनरेशन X की पीढ़ी खुद या बच्चों के हाथ में नाम, पता या धार्मिक चिन्ह गुदवा देते थे. वही ट्रेंड जेन Z आते-आते टैटू बन गया. आज खुद को स्टाइलिश दिखाने के लिए टैटू बनवाने का चलन है. देश में दो हजार रुपये से लेकर 200 रुपये में टैटू बनाने वाले आर्टिस्ट मौजूद हैं. बड़े पार्लर के दाम इतने ज्यादा हैं कि आम आदमी ऑनलाइन रेट पता करके, वहां जाने की हिम्मत तक नहीं जुटा सकता.
पहले आज जैसे कथित हाईजीन फ्रेंडली टैटू पार्लर नहीं थे, लेकिन शायद ही कभी ऐसा मामला सामने आया हो, जब शरीर पर कुछ गुदवाने वाला एलर्जी या जानलेवा बीमारी का शिकार हुआ हो, लेकिन लंबे समय से टैटू बनवाने के बाद लोगों को स्किन एलर्जी से एचआईवी जैसी कई जानलेवा बीमारियां होने की खबरें आई हैं.
कर्नाटक क्यों चाहता है पूरे देश में एक नियम?
देश के कई शहरों में फुटपाथ पर जगह-जगह टैटू बनाने वालों के स्टॉल से लेकर पॉश इलाकों में मौजूद कथित सर्टिफाइड टैटू पार्लर तक डर का माहौल है. टैटू बनवाने से बहुत से लोग बीमार हुए हैं, उसकी सबसे बड़ी वजह व्यापक गाइडलाइन न होने से जवाबदेही का अभाव मानी जाती है.
ट्रेंड के बीच कड़े नियमों की वजह इसलिए भी महसूस हो रही है कि कई देशो में टैटू के लिए इस्तेमाल हो रही स्याही से लेकर सुई तक पर स्पष्ट नियम और कानून नहीं है. इस वजह से ऐसे उत्पाद लगातार बनते जा रहे हैं, जिनमें इस्तेमाल की जाने वाली चीजों के बारे में बहुत से लोगों को जानकारी नहीं होती.
कर्नाटक सरकार का मानना है कि जब तक पूरे देश में टैटू स्याही के आयात, निर्माण और टैटू पार्लरों के संचालन के लिए एक पारदर्शी कानून नहीं होगा, तब तक टैटू बनवाने वाले लोगों की हेल्थ की सुरक्षा करना एक चुनौतीपूर्ण काम बना रहेगा. कर्नाटक के स्वास्थ्य विभाग की रिपोर्ट में साफ लिखा है कि टैटू इंक में कई तरह के केमिकल और मेटल होते हैं जो टैटू बनवाने के प्रोसेस के दौरान ब्लडस्ट्रीम में जा सकते हैं.
टैटू की स्याही में भारत से अमेरिका तक क्या मिला होता है?
सुई, स्याही और कुछ कथित एंटीसेप्टिक प्रोडक्ट्स टैटू बनाने के काम के मेन इंग्रेडिएंट्स हैं. कर्नाटक स्वास्थ्य विभाग की 2025 और 2026 की रिपोर्ट्स के मुताबिक इसकी स्याही से कैंसर और सुई से एचआईवी एड्स का खतरा बढ़ा है. स्याही के बारे में तो हम आपको बताएंगे, पहले टैटू बनाने के काम आने वाली सुई के दाम से जुड़ा ये फैक्ट देख लीजिए, काफी हद तक आपको टैटू बनवाने के एक-आधे खतरे का अंदाजा हो जाएगा.
2025 में तत्कालीन स्वास्थ्य मंत्री गुंडू राव ने बताया था कि फूड सेफ्टी डिपार्टमेंट की पड़ताल के दौरान टैटू की स्याही में 22 खतरनाक धातुएं पाई गई थीं. उनकी वजह से स्किन कैंसर, एचआईवी, हेपेटाइटिस बी, हेपेटाइटिस सी होने का खतरा बताया गया था. स्याही में स्टैफिलोकोकस ऑरियस जैसे बैक्टीरिया पाए गए. जांच रिपोर्ट में खराब सफाई स्टैंडर्ड और टैटू प्रक्रिया में खतरनाक केमिकल्स के इस्तेमाल पर भी चिंता जताई गई थी.
अमेरिकी शोधकर्ताओं ने मार्केट में मौजूद करीब 100 तरह की टैटू इंक की जांच करके बताया है कि भले ही इन उत्पादों पर सामग्री की सूची दी गई हो, लेकिन अक्सर वो सही नहीं होती. उन्हें स्याही में उन धातुओं के छोटे-छोटे कण मिले हैं जो मानव शरीर की कोशिकाओं के लिए नुकसानदायक हो सकते हैं.
पिगमेंट पार्टिकल्स
अमेरिकन केमिकल सोसायटी ने बिंघमटन यूनिवर्सिटी के पीएचडी स्कॉलर जॉन स्विर्क के साथ किए एक वीडियो इंटरव्यू में बताया कि टैटू बनाने के काम आने वाली स्याही में तमाम मेटल्स होते हैं. टैटू की तमाम रंगीन स्याही बनाने के लिए कई रासायनिक यौगिकों का प्रयोग किया जाता है. इसमें तमाम मिनरल्स, वेजिटेबल डाई और प्लास्टिक की मौजूदगी पाई गई है.
- रेड इंक में मर्करी और कैडमियम होते हैं, जिनसे गंभीर एलर्जी संभव है.
- नीली और हरी स्याही में कोबाल्ट, तांबा और लेड यानी सीसा मिला होता है. ये भी पूरी तरह से सेफ नहीं मानी जा सकती है.
- काली रंग की स्याही में भारी मात्रा में पॉलीसाइक्लिक एरोमैटिक हाइड्रोकार्बन (PAHs) एलिमेंट होते हैं जो कार्सिनोजेनिक है, जिससे कैंसर का खतरा होता है.
- कई बार टैटू आर्टिस्ट पुरानी इंक का इस्तेमाल करते हैं, जिसमें बैक्टीरिया हाे सकते हैं, जो फंगल इन्फेक्शन का कारण बन सकते हैं.
आपके शरीर पर टैटू की स्याही का शुरुआती असर
जिसने टैटू बनवा रखा है, उसे कुछ अंदाजा होता है, लेकिन जो पहली बार बनवाना चाहता है, उसके दिमाग में कई सवाल होते होंगे, जैसे स्याही क्या खून में मिलती है या सुई स्किन के कितने अंदर तक (किस लेयर) तक जाती है?
Tattoos as a risk factor for systemic lymphoma: A population-based case-control study नाम से छपी रिपोर्ट में लिखा है कि जैसे ही टैटू की स्याही टैटू बनवाने वाले की त्वचा में इंजेक्ट होती है, उसकी बॉडी स्याही के अंदर मौजूद पिगमेंट पार्टिकल्स यानी बारीक रंगीन ठोस कणों को बाहरी हमलावर के तौर पर पहचानकर रिएक्ट करती है.
मेडिकल न्यूज़ टुडे की रिपोर्ट के मुताबिक टैटू की स्याही त्वचा की दूसरी परत यानी डर्मिस तक जाती है, यानी ये ऊपरी परत एपिडर्मिस को पार करती है, लेकिन सबसे निचली वसा की परत (सबक्यूटेनियस फैट) के ऊपर रहती है. टैटू आर्टिस्ट की जरा सी भी गलती से मामला तत्काल गंभीर स्थिति में पहुंच सकता है.
तत्काल खतरा
ये पिगमेंट पार्टिकल्स किसी भी माध्यम जैसे पानी, पसीना या तेल जैसी किसी भी चीज में नहीं घुलते हैं. यही कण टैटू वाले हिस्से को चमकदार बनाते हैं. टैटू बनवाने की स्याही में मौजूद मैटल के पार्टिकल्स से शरीर में सूजन आ सकती है. त्वचा में सूजन, मवाद, बड़े-बड़े चकत्ते और लाल रेशे पड़ सकते हैं. यानी सबसे तत्काल खतरा एलर्जी होने का है. कुछ रिपोर्ट्स के मुताबिक टैटू वाली स्याही के कण शरीर के नर्वस सिस्टम को भी नुकसान पहुंचा सकते हैं.
हिपेटाइटिस बी समेत अन्य खतरे संभव
नई रिसर्च से पता चलता है कि यह अंदरूनी इंक जमाव नॉर्मल इम्यून फंक्शन में रुकावट डाल सकता है, जिससे mRNA टाइप सहित कुछ वैक्सीन का असर कम हो सकता है. यानी जब पुरानी वैक्सीन का असर कम हो जाता है. वैसे ही इस स्याही और सुई की वजह से हेपेटाइटिस बी और सी का खतरा बढ़ जाता है.
यूरोपियन केमिकल एजेंसी से पता चला है कि टैटू बनवाए जाने के बाद स्याही के सूक्ष्म कण रक्तप्रवाह के जरिए शरीर के लिम्फ नोड्स तक पहुंच जाते हैं. लिम्फ नोड्स हमारे इम्यून सिस्टम का महत्वपूर्ण हिस्सा हैं. जब स्याही के जहरीले कण यहां जमा होते हैं, तो ये ब्लड कैंसर का कारण बन सकते हैं.
मेटलिक स्याही अगर संक्रमित सुई के कारण ब्लड-बॉर्न (खून से फैलने वाले) वायरस सीधे ब्लडस्ट्रीम में पहुंच जाए तो लिवर को गंभीर नुकसान पहुंच सकता है.
साइंस जर्नल ‘जर्नल ऑफ एनालिटिकल केमिस्ट्री’ में पब्लिश एक स्टडी के मुताबिक, टैटू इंक में मौजूद खतरनाक केमिकल्स स्किन, लंग्स और लिवर में इरिटेशन पैदा कर सकते हैं.
टैटू बनवाने के बाद शरीर के इम्यून सिस्टम और स्किन में मौजूद बाहरी चीजों के आक्रमण से होने वाले बायोलॉजिकल टकराव बचपन में लगी वैक्सीन का असर कम कर सकते हैं.
- स्वीडन की लुंड यूनिवर्सिटी के मुताबिक टैटू बनवाने से लिम्फोमा यानी ब्लड कैंसर का खतरा 21% तक बढ़ जाता है.
- ये स्टडी ई-क्लिनिकल मेडिसिन जर्नल में छपी थी. सैंपल साइज में बहुत से मरीज ऐसे थे जिनकी बॉडी में टैटू था.
- नेशनल लाइब्रेरी ऑफ मेडिसिन और अमेरिकी स्वास्थ्य विभाग की केस स्टडी में टैटू बनवाने से कैंसर होने के खतरे का जिक्र है.
- ये स्याही स्किन कैंसर का शिकार बना सकती है.
- किसी एड्स पीड़ित के शरीर में गई सुई किसी अन्य को टैटू बनाने में इस्तेमाल की जाए तो आगे एड्स होने का खतरा बढ़ जाता है.
- करीब दो साल पहले अप्रैल, 2024 में यूपी के पूर्वांचल के 10 जिलों में 40 लोग टैटू बनवाने के बाद एचआईवी संक्रमित हो गए थे.
- कुछ अन्य रिसर्च रिपोर्टस से पता चलता है कि टैटू से स्किन कैंसर का रिस्क बढ़ जाता है.
हालांकि केवल टैटू बनवाने से कैंसर होने का सीधा प्रमाण हर मामले में नहीं मिला है, लेकिन यूरोपीय संघ (EU) ने स्वास्थ्य जोखिमों को देखते हुए 2022 में कई तरह के खतरनाक केमिकल्स पर बैन लगाया था, जिनता इस्तेमाल टैटू इंक में होता है. भारत में ऐसे एकरूप मानक वाले प्रतिबंध न होने से कैंसर और इम्यून सिस्टम से जुड़ी बीमारियों का खतरा बना रहता है.
किन लोगों को सावधानी बरतनी चाहिए?
सोशल मीडिया पर ऐसे तमाम केस हाईलाइट होने के बाद डॉक्टरों की पहली सलाह ये है कि अगर आपकी स्किन सेंसिटिव है, तो टैटू नहीं बनवाना चाहिए. यानी अगर पहले बालों में डाई या फेशियल में ब्लीच या अन्य केमिकल के संपर्क में आने से कोई शिकायत हो चुकी है तो टैटू नहीं बनवाना चाहिए. वहीं पहले से गंभीर बीमारी का शिकार लोगों को टैटू बनवाने से परहेज करना चाहिए. खासकर प्रेग्नेंट महिलाएं जो किसी गायनेकोलॉजिस्ट से इलाज करा रही हों और वो पुरुष जो बीपी-सुगर और कमजोर इम्यूनिटी की समस्या से पीड़ित हों उन्हें भी टैटू नहीं बनवाना चाहिए.
भारत में टैटू पॉर्लर को शुरू करने यानी रेगुलेशन को लेकर फिलहाल क्या है स्थिति?
वर्तमान में भारत में टैटू आर्टिस्ट्स के लिए कोई समर्पित राष्ट्रीय लाइसेंसिंग सिस्टम या केंद्रीय कानून नहीं है. हमारे देश में टैटू उद्योग काफी हद तक असंगठित क्षेत्र के अंतर्गत आता है.
भारत में स्याही की जांच खाद्य और औषधि विभाग करता है. टैटू से बीमारी होने की शिकायतों मिलने का बाद स्याही और अन्य सामान के नमूने लेकर बेंगलुरू और हैदराबाद की लैब में भेजे जाते हैं. वहां से रिपोर्ट आने के बाद जिला प्रशासन ऐसे टैटू पार्लरों को पुलिस की मदद से सील करता है.
दिल्ली, मुंबई, हैदराबाद और बेंगलुरु जैसे शहरों में स्थानीय नगर निगम से हेल्थ ट्रेड लाइसेंस लेना जरूरी होता है. इस लाइसेंस में ये तय किया जाता है कि स्टूडियो में साफ-सफाई के नियमों का पालन हो रहा है. वहीं ऐसे स्टूडियो का शॉप्स एंड एस्टेब्लिशमेंट रजिस्ट्रेशन यानी राज्य के श्रम विभाग द्वारा रजिस्ट्रेशन जरूरी है.
केरल और कर्नाटक ने स्थिति की गंभीरता को ध्यान में रखते हुए कुछ गाइडलाइंस बनाई हैं. केरल देश का पहला ऐसा राज्य बन गया है, जिसने टैटू आर्टिस्ट्स और स्टूडियो के लिए संचालन लाइसेंस अनिवार्य किया है. वहां बिना लाइसेंस और बायोमेडिकल कचरा प्रबंधन के नियमों के पालन के बिना काम करने पर रोक लगाई गई है. कर्नाटक में जरूरी गाइडलाइंस बनाई जा रही हैं.
क्या सावधानी बरतें
जब तक भारत में एकीकृत राष्ट्रीय मानक(नियम) लागू नहीं होते, तब तक व्यक्तिगत स्तर पर सावधानी बरतना बेहद जरूरी है. सर्टिफाइड पार्लर का चुनाव करें, जिनकी ऑनलाइन रेटिंग्स और रिव्यूज अच्छे हों, केवल उन्हीं टैटू पार्लर और स्टूडियो का चुनाव करना चाहिए जहां साफ-सफाई का ध्यान रखे जाने के साथ लाइसेंस, स्वच्छता और सुरक्षा प्रोटोकॉल का पालन किया जाता हो.
टैटू बनवाने से पहले वहां मौजूद सुई और उपकरणों की जांचकर ये सुनिश्चित करें कि टैटू आर्टिस्ट ने आपके सामने नई, सीलबंद और स्टेरिल सुई आपके सामने निकाली हो. स्याही कैसी है, क्या वो अंतरराष्ट्रीय सुरक्षा मानकों के अनुकूल, यानी सेफ है, ये भी पूछें. टैटू बनने के बाद आफ्टरकेयर का ध्यान रखें. आर्टिस्ट की सलाह का सख्ती से पालन करें. सूजन या रेडनेस दिखने पर स्किन के डॉक्टर से संपर्क करें. यानी आपका टैटू सिर्फ स्टाइल स्टेटमेंट नहीं, बल्कि ऐसा ट्रिगर है, जो आपको जिंदगीभर का दर्द भी दे सकता है.
देश में टैटू का मार्केट बहुत बड़ा हो चुका है. इसलिए तत्काल ऐसी डेडीकेटेड सरकारी नियामक संस्था की जरूरत है, जो स्याही के मानकों को तय करके, उसमें मौजूद सामग्री का स्पष्ट उल्लेख कराए. निडिल्स के स्टॉक और इस्तेमाल का रिकॉर्ड ट्रैक करे. संक्रमण या बीमारी होने पर टैटू पार्लर या टैटू आर्टिस्ट की जवाबदेही तय करे और देशभर में टैटू पार्लरों का रजिस्ट्रेशन अनिवार्य कराए, ताकि लोगों को सुरक्षित टैटू बनवाने का विकल्प मिल सके.
Bureau Report
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