जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय (JNU) की कुलपति शांतिश्री धूलिपुड़ी पंडित का एक बयान इन दिनों चर्चा में है. उन्होंने आर्थिक तंगी से जूझ रहे विश्वविद्यालय की आय बढ़ाने के लिए परिसर में भगवान वेंकटेश्वर का मंदिर बनाने का सुझाव दिया है. उनका कहना है कि इससे विश्वविद्यालय के लिए आय का एक स्थायी स्रोत तैयार हो सकता है, लेकिन उनका बयान सिर्फ मंदिर तक सीमित नहीं रहा. उन्होंने द्रौपदी को पहली फेमिनिस्ट बताने, जेएनयू के इतिहासकारों की सोच, लेफ्ट-राइट की अकादमिक बहस, भारतीय ज्ञान प्रणाली (IKS), अंग्रेजी और भारतीय भाषाओं में अंतर और भारत की प्राचीन विरासत जैसे मुद्दों पर भी खुलकर अपनी बात रखी.
जेएनयू की कुलपति शांतिश्री के इस बयान के बाद सवाल उठता है कि आखिर JNU की VC ने मंदिर का उदाहरण क्यों दिया और उनके इस बयान के पीछे विश्वविद्यालय की फंडिंग से लेकर भारतीय ज्ञान परंपरा तक की पूरी कहानी क्या है? आइए पूरा मामला क्या है, जान लेते हैं.
‘हम भिखारी हैं, मंदिर बनाना चाहिए’
हिंदू विश्वविद्यालय (BHU) में आयोजित भारतीय ज्ञान परंपरा से जुड़े एक सम्मेलन के दौरान शांतिश्री धूलिपुड़ी पंडित ने विश्वविद्यालय के परिसर में भगवान वेंकटेश्वर का मंदिर बनाने का सुझाव दिया है. आगे उन्होंने मजाकिया अंदाज में जेएनयू की आर्थिक स्थिति का जिक्र करते हुए कहा कि संस्थान के पास पैसे की कमी है और मंदिर से अच्छी आय हो सकती है. उन्होंने बताया कि वो आंध्र प्रदेश से आती हैं, जहां भगवान वेंकटेश्वर के प्रति लोगों की काफी आस्था है. इसलिए उन्होंने जेएनयू में भी वेंकटेश्वर मंदिर बनाने का विचार सामने रखा.
BHU के विश्वनाथ मंदिर का क्यों दिया उदाहरण?
उन्होंने आगे बीएचयू के संस्थापक मदन मोहन मालवीय के विचारों का उल्लेख किया. उन्होंने कहा कि किसी विश्वविद्यालय को सिर्फ सरकारी सहायता पर निर्भर नहीं रहना चाहिए. संस्थान के पास ऐसे साधन भी होने चाहिए, जिनसे लंबे समय तक आय होती रहे. इस बात को समझाने के लिए उन्होंने बीएचयू के विश्वनाथ मंदिर का उदाहरण दिया. उनका सुझाव था कि जेएनयू भी अपनी आर्थिक जरूरतों को पूरा करने के लिए ऐसे आय के स्थायी साधन पर विचार कर सकता है.
JNU के इतिहासकारों पर भी सवाल
उन्होंने आगे जेएनयू के इतिहासकारों पर भी सवाल उठाते हुए कहा कि इतिहास में तथ्य सबसे अहम होते हैं, जबकि उनकी व्याख्या अलग-अलग हो सकती है. उनका आरोप था कि जेएनयू में कुछ इतिहासकारों ने तथ्यों और उनकी व्याख्या की प्राथमिकता को उलट दिया है. उन्होंने ये भी कहा कि किसी विश्वविद्यालय में अगर एक ही विचारधारा का प्रभाव बहुत ज्यादा हो जाए तो अलग-अलग विचारों और बहस के लिए जगह कम हो जाती है.
IKS को लेकर क्या बोलीं शांतिश्री
उस दौरान उन्होंने इंडियन नॉलेज सिस्टम (IKS) पर बोलते हुए कहा कि IKS का मकसद किसी एक विचारधारा को दूसरी विचारधारा से बदलना नहीं होना चाहिए. उनके अनुसार भारतीय ज्ञान परंपरा काफी व्यापक है. इसमें अलग-अलग भाषाओं, क्षेत्रों, समुदायों और विचारधाराओं की भूमिका रही है. इसलिए इसे किसी एक खांचे में सीमित करना सही नहीं होगा.
‘द्रौपदी पहली फेमिनिस्ट थीं’
उन्होंने जब आगे नारीवाद पर बात की तब महाभारत की द्रौपदी का उदाहरण दिया और कहा कि नारीवाद की शुरुआत सिर्फ पश्चिमी विचारकों से जोड़कर नहीं देखी जानी चाहिए. उन्होंने द्रौपदी को पहली फेमिनिस्ट बताते हुए कहा कि उन्होंने अपने पति से कई ऐसे सवाल किए थे, जिन्हें आज के समय में भी पूछना आसान नहीं है. उन्होंने भारत में देवी पूजा की परंपरा का भी जिक्र किया. उन्होंने चामुंडेश्वरी और मदुरै मीनाक्षी जैसी देवियों के उदाहरण दिए.
अंग्रेजी जरूरी, लेकिन भारतीय भाषाओं पर भी जोर
भाषाओं पर बात करते हुए उन्होंने कहा कि अंग्रेजी को दुश्मन मानने की जरूरत नहीं है क्योंकि विज्ञान, तकनीक और डिप्लोमेसी में अंग्रेजी की खास भूमिका होती है. हालांकि, उन्होंने संस्कृत के साथ तमिल, पाली, प्राकृत और दूसरी भारतीय भाषाओं को मजबूत करने की जरूरत बताई. उन्होंने आगे कहा है कि भारत अपनी ज्ञान परंपरा को सिर्फ अंग्रेजी के माध्यम से नहीं समझ सकता.
क्यों चर्चा में है JNU की VC शांतिश्री पंडित का बयान?
हिंदू विश्वविद्यालय के भारतीय ज्ञान परंपरा से संबंधित सम्मेलन के दौरान जेएनयू की वीसी शांतिश्री धूलिपुड़ी पंडित ने कई मुद्दों पर बात की, लेकिन उनका एक बयान यूनिवर्सिटी में मंदिर बनाने का सुझाव देने वाला उन्होंने सुर्खियों में ले आया है. दरअसल, उन्होंने जेएनयू की आर्थिक जरूरतों को पूरा करने के लिए मंदिर से आय जुटाने का सुझाव दिया है. हालांकि, उन्होंने सिर्फ मंदिर पर नहीं बल्कि कई मुद्दों पर अपनी राय रखी है.
Bureau Report
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