16 कलाओं से संपन्न श्री कृष्ण को भगवान विष्णु का पूर्णावतार माना जाता है. उनका पूरा जीवन एक पाठशाला है, जिससे सीख लेकर लोग संसार रूपी भवसागर पार करने के साथ परलोक भी संवार सकते हैं. गीता के ज्ञान के अलावा उन्होंने अपनी लीलाओं के जरिए भी मनुष्यों को सच्चाई और धर्म की राह पर चलाया. श्री कृष्ण के प्रेम और भक्ति में डूबे लोग धर्म-जाति, घर-परिवार और दुनियादारी भूलकर बस उन्हीं के हो गए और खुद को भगवान की सेवा में समर्पित कर दिया.
जन्माष्टमी के मौके पर आइए उन महान हस्तियों के बारे में जानते हैं जो हर सांसारिक बंधन को तोड़कर भजन, सत्य और सन्मार्ग की राह पर चलकर उनके अनन्य भक्त कहलाने के अधिकारी बने.
ऐसे कृष्ण प्रेमियों में सबसे प्रमुख नाम मशहूर कवि रसखान (सैयद इब्राहिम) का है. 16वीं सदी में विट्ठलनाथ से दीक्षा लेकर ब्रज की भूमि को अपना घर मानने वाले रसखान के प्रेम को शब्दों में बयां करना मुश्किल है.
ये भगवान कृष्ण का प्रेम ही है जिसने सदियों पहले रसखान और मुगल हरम की ताज बीबी से लेकर कभी पांच वक्त के नमाजी रहे शीबू और सात समंदर पार अमेरिका, रूस, यूक्रेन समेत दुनियाभर के लोगों को अपना सब कुछ छोड़कर उनकी भक्ति में डूबने को मजबूर कर दिया. कृष्ण का वो कौन सा आकर्षण है जिसके लिए दुनिया भर में मज़हबों की दीवार टूट गई? आइए जानते हैं.
रसखान की कृष्ण भक्ति इतनी निश्छल थी कि उन्होंने अपने एक सवैया में लिख दिया- ‘मानुष हौं तो वही रसखानि, बसौं ब्रज गोकुल गांव के ग्वारन.’
जब मुस्लिम जावेद बने सनातनी श्री कृष्ण भक्त
बिहार के बेतिया में एक मुस्लिम घर में पैदा हुए मोहम्मद जावेद को कन्हैया की ऐसी लगन लगी कि वो भगवान कृष्ण की भक्ति की तरफ खिंचे चले गए. उनकी पहचान अब शीबू कृष्णदासी के रूप में होती है. आइए आपको शीबू की जुबानी बताते हैं श्रीकृष्ण के प्रेम में फंसने की दिलचस्प कहानी.
ज़ी मीडिया से विशेष बातचीत में कृष्ण भक्तों के मुंह से ये बोल फूट पड़े – ‘अगर भूत चिपक जाए तो उसका इलाज है, लेकिन नंद का पूत चिपक जाए तो उसका कोई इलाज नहीं है.’
यहूदी महिला ने कृष्ण को अपना माना
इस्कॉन के एक मंदिर में माला जपने वाली माता जी ने बताया कि उन्होंने यहूदी परिवार में जन्म लिया, लेकिन आज कृष्ण ही उनके भगवान है और वो उनकी सेवक हैं. उन्होंने ये भी कहा- ‘हम कोशिश करते हैं कि इस जीवन में अगले जीवन में राधे कृष्ण की सेवा कर सकें.’
वहीं थोड़ी दूर बैठी रूस से आई एक बिटिया भगवान के भजन में डूबकर मंजीरा बजाते हुए नज़र आई. ज़ी मीडिया की टीम को देखकर उसकी तंत्रा टूटी तो उसने बताया, ‘मेरे लिए कृष्णा एक मित्र हैं. भगवान हैं. वहीं सब कुछ है.
सदियों पहले रसखान ने भगवान से विनती करते हुए लिखा था-
मानुष हौं तो वही रसखानि, बसौं ब्रज गोकुल गांव के ग्वारन।
जौ पसु हौं तौ कहा बस मेरो, चरौं नित नंद की धेनु मंझारन॥
अर्थात हे प्रभु! अगर मुझे अगला जन्म मनुष्य का मिले, तो मैं ब्रज और गोकुल के ग्वालों के बीच ही निवास करूं. अगर पशु बनूं तो मेरी विनती है कि मैं नित्य नंद बाबा की गायों के बीच ब्रज में ही चरने जाऊं. यदि पत्थर बनूं, तो उसी गोवर्धन पर्वत का हिस्सा बनूं, जिसे आपने इंद्र का घमंड तोड़ने के लिए अपनी उंगली पर छतरी की तरह उठा लिया था और यदि पक्षी का जन्म मिले, तो मेरा बसेरा यमुना किनारे कदंब के पेड़ की डालियों पर हो.
भगवान कृष्ण को महसूस करने रसखान की समाधि गोकुल के रेती रमण क्षेत्र में हैं. सैयद इब्राहिम खान उर्फ रसखान थे तो पैदाइशी कट्टर पठान लेकिन उनके कानों में जब कृष्ण की बांसुरी की तान पड़ी, तो इब्राहिम खान, ‘रस की खान’ यानी ‘रसखान’ बन गए.
400 साल बीत गए, हुकूमतें बदल गईं, नक्शे बदल गए. लेकिन कट्टर मुसलमान बनकर पैदा हुए और कृष्ण भक्त बनकर आखिरी सांस लेने वाले रसखान का कृष्ण-प्रेम गोकुल में इस समाधि में आज भी उसी तरह जाग्रत है.
डॉ उमेश चंद्र शर्मा ने बताया कि रसखान के अंदर ऐसी छटपटाहट थी कृष्ण दर्शन की लालसा थी कि वह इस भाव में आकर के यहीं रह गए. भगवान के हो गए.
रसखान समाधि परिसर के इंचार्ज अनुपम कुमार ने बताया कि रसखान दिल्ली छोड़कर ब्रज में आ गए थे. बस एक बच्चे को देखने की लालसा में उन्होंने जीवन न्योछावर कर दिया.
ऐसे ही ब्रज के गायक मधुकर जी ने उनका किस्सा बताते हुए कहा कि वो तो भगवान कृष्ण का एक चित्र देखकर उनके दीवाने हो गए थे. वो सबसे पागल की तरह पूछ रहे थे गोकुल में कि यह कहां रहता है. वो चित्रपट दिखाकर कुछ लोगों ने उनका मजाक बनाया तो आखिरकार ठाकुर जी को आना पड़ा. ठाकुर जी ने बताया कि वो उधर रहते हैं, मंदिर की तरफ इशारा करके.
कैसे बने ‘रस की खान’?
शास्त्र पढ़ि पंडित भये, भक्त भये बिन ज्ञान।
रसखान प्रेम के बिना, सब साधन निष्प्राण॥
रसखान ने जो लिखा, वह सिर्फ दोहे और सवैया नहीं, बल्कि उनके दिल में उमड़ा कृष्ण प्रेम है. फारसी और उर्दू के संस्कारों में पले-बढ़े व्यक्ति की जुबान से ऐसी सुरीली ब्रजभाषा फूटी कि स्वयं ब्रजवासी हैरान रह गए. उनके सवैयों में न कोई बाहरी आडंबर था, न पांडित्य, उसमें केवल और केवल कृष्ण-प्रेम का वो रस था, जिसने उन्हें ‘रस की खान’ बना दिया.
कृष्ण ही नहीं, बृज की भाषा-संस्कृति को भी अपना लिया
रसखान ने ‘सुजान-रसखान’, ‘प्रेमवाटिका’, ‘दानलीला’ और ‘अष्टयाम’ जैसे अमर कृष्ण-काव्य रचे, जिनमें ब्रजभाषा के बेजोड़ सवैये शामिल हैं. उनका यही भक्ति साहित्य आज देशभर के स्कूलों से लेकर विश्वविद्यालयों और प्रतियोगी परीक्षाओं के सिलेबस में पढ़ाया जाता है.
ब्रज गायक मधुकर जी ने आगे बताया कि जब किसी रसिक पर ठाकुर जी की कृपा हो तो भाषाएं अपने आप खड़ी हो जाती हैं और ब्रज भाषा में उन्होंने जो वर्णन किया वो अद्भुत किया. वहीं उमेश चंद्र शर्मा ने बताया कि रसखान ने सिर्फ श्रीकृष्ण को आत्मसात नहीं किया, उनकी आम बोलचाल की भाषा को भी आत्मसात कर लिया.
इसी परंपरा में 17वीं सदी की कवयित्री ताज बीवी का नाम आता है. इतिहासकार डॉ. विजेंद्र एक जगह लिखते हैं- अकबर के समकालीन रहीं ताज बीवी कृष्ण रूप पर इस कदर मोहित थीं कि उन्होंने लिखा- ‘सुनो दिलजानी, मेरे दिल की कहानी, मैं चेरी तेरे द्वार की.’
20वीं सदी की बात करें तो संगीत की दुनिया के उस्ताद भारत रत्न बिस्मिल्लाह खान का नाम है. समाचार पत्रों और दूरदर्शन पर प्रसारित कार्यक्रमों के अलावा सरकारी अभिलेखागारों में दर्ज साक्षात्कारों के मुताबिक, उस्ताद जी काशी विश्वनाथ मंदिर और संकटमोचन में शहनाई बजाते थे और कृष्ण भजनों में उनका गहरा विश्वास था.
इन महान हस्तियों का जीवन ये बताता है कि श्रीकृष्ण के लिए उनका प्रेम, प्रेम की वो पराकाष्ठा है, जहां जाति और धर्म के बंधन पूरी तरह मिट जाते हैं.
Bureau Report
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