बीमारी के नाम पर आपकी जेब कौन काट रहा? दवाओं की मुनाफाखोरी पर सबसे बड़ा खुलासा

बीमारी के नाम पर आपकी जेब कौन काट रहा? दवाओं की मुनाफाखोरी पर सबसे बड़ा खुलासा

दवा, देश के हर परिवार की जरूरत है. हर देशवासी को दवाओं की जरूरत पड़ती ही है. आम आदमी को अक्सर आपने ये कहते हुए सुना होगा कि आजकल इलाज बहुत महंगा हो गया है. इलाज महंगा हुआ नहीं है, इसे महंगा बनाया गया है. लालची मुनाफाखोरों ने इसे महंगा बनाया है, जो भारतवासियों के दुख-दर्द को अपने मुनाफे का मौका मानते हैं. इस नेटवर्क को हमने नाम दिया है—’दवा डॉन मंडली’, जो किसी माफिया डॉन की तरह वसूली करती है.

दिल्ली में दवाओं की होलसेल मार्केट से कुछ दवाइयां खरीदी हैं. हमने सिपकाल टैबलेट के दो पत्ते, NEFLOX का एक पत्ता, निसिप प्लस टैबलेट का दो पत्ते, ओकामेट के दो पत्ते, पैंटोसेक के पांच पत्ते, पैंटोसेक-DSR  के दो पत्ते और REXOF सिरप खरीदी. कुल 7 दवाइयां हैं. अब इनकी कीमत देखिए. दवाओं की कीमत है 361 रुपए 46 पैसे. इस पर दिल्ली और केंद्र सरकार का GST लगा 18 रुपए 6 पैसे. और हमें ये दवाईयां मिलीं 380 रुपए की.  

सिपकाल के 15 टैबलेट वाले पत्ते की MRP 104 रुपए है. यानी दुकानदार अगर चाहे तो ये दवा हमें 104 रुपए की बेच सकता है. हालांकि वो चाहे तो 50 रुपए डिस्काउंट कर यही दवा हमें 54 रुपए में भी बेच सकता है. लेकिन होलसेल मार्केट में दुकानदार ने हमें सिपकाल का पूरा पत्ता दिया मात्र 23 रुपए 81 पैसे का. टैक्स के साथ MRP के करीब एक चौथाई दाम पर. यानी होलसोल रेट में.

समझिए 100 रुपए की दवा में 75 रुपए का मुनाफा है. सोचिए 23 रुपए में हमें जो 15 टैबलेट का पत्ता मिला उसमें भी होलसेलर का मुनाफा होगा. सिप्ला यानी जिस कंपनी ने दवा बनाई है, उसका मुनाफा भी इसमें है. फिर सवाल ये है कि आखिर सिप्ला ने दवा के पैकेट पर 104 रुपए MRP क्यों लिखे? क्या ये आपकी-हमारी कमाई पर डकैती नहीं है. क्यों नहीं दवाई के पैकेट पर उतनी ही कीमत लिखी जाती है जितनी में इसे बेचा जाना है? इस सवाल पर हम आगे चर्चा करेंगे. लेकिन पहले आप देखिए कैसे आपकी हमारी जेब काटी जाती है. दवाइयों की लिस्ट लेकर हम एक केमिस्ट शॉप पर गए. वहां क्या हुआ पहले वो पढ़िए. 

सिपकाल के 15 टैबलेट का एक पत्ता हमें होलसेल मार्केट में 23 रुपए का मिला था. एक टैबलेट की कीमत करीब 1 रुपए 67 पैसे की मिली थी. लेकिन करीब 44 किलोमीटर दूर यही सिप्ला की सिपकाल टैबलेट का एक पत्ता हमें मिला 104 रुपए का.

यानी महज 44 किलोमीटर की दूरी में सिपकाल की एक टैबलेट 1 रुपए 67 पैसे से 6 रुपए 93 पैसे की हो गई. यानी 44 किलोमीटर की दूरी में सिपकाल की एक टैबलेट का दाम 415 फीसदी तब बढ़ गया.

दिल्ली में ही टैबलेट के पत्ते की  कीमत 415 फीसदी तक महंगी हो गई. ये मेडिसिन रैकेट के लालच का का प्रमाण है. दवा महंगी क्यों हुई. क्योंकि दवा के पैकेट पर MRP 104 रुपए लिखा गया था. अब सवाल ये है कि क्या देश में दवाइयों के दाम तय करने का कोई नियम है भी या नहीं? और अगर नियम है तो इसमें मनमानी MRP को कंट्रोल क्यों नहीं किया जा रहा है. पहले आप समझिए की देश में दवा के दाम कंट्रोल करने के नियम क्या हैं?

जीवन रक्षक दवाओं के दाम तय करने का फॉर्मूला क्या है?

देश में दवाओं की कीमत ड्रग प्राइस कंट्रोल ऑर्डर 2013 से कंट्रोल होती है. ये Essential Commodities Act 1955 की धारा 3 के तहत जारी किया गया है. National Pharmaceutical Pricing Authority इसे लागू करती है.

DPCO के तहत दवाओं को दो श्रेणियों में बांटा गया है. पहली श्रेणी है Scheduled यानी जीवन रक्षक दवाओं की. कैंसर, दिल की बीमारी, आंखों की बीमारी जैसी 27 बीमारियों की दवाओं को जीवन रक्षक दवाओं की श्रेणी में रखा गया है.  

दूसरी क्षेणी है Non Scheduled यानी वो दवाएं जो जीवन रक्षक दवाओं की श्रेणी से बाहर हैं.  

Scheduled यानी जीवन रक्षक दवाओं की श्रेणी में 384 दवाएं हैं. इनके 1000 से ज्यादा formulations हैं. दवा बाजार में जीवन रक्षक दवाओं की हिस्सेदारी महज 18 फीसदी है.

जबकि दवाओं के बाजार में 82 फीसदी हिस्से पर Non Scheduled दवाओं का कब्जा है. इन दवाओं की MRP फिक्स नहीं होती है. ज्यादातर लोगों को इन्हीं दवाओं की जरूरत पड़ती है.

अब आपको ये भी बताते हैं कि Scheduled यानी जीवन रक्षक दवाओं के दाम तय करने का फॉर्मूला क्या है?

Scheduled दवाओं में होलसेलर को 8% और रिटेलर को 16 फीसदी का प्रॉफिट मर्जिन मिलता है. यानी अगर आप 100 रुपए की दवा खरीदते हैं तो उसमें से होलसेलर को 8 रुपए और रिटेलर को 16 रुपए मुनाफा होगा. यानी दवा के दाम का करीब एक चौथाई हिस्सा मुनाफा के लिए होगा.

Non Scheduled दवाओं की बात करें तो इसमें MRP तय करने का कोई फॉर्मूला नहीं है. हां दवा निर्माता को हर साल 10 फीसदी दाम बढ़ाने की अनुमति होती है. लेकिन शुरुआती MRP दवा निर्माता खुद तय करते हैं. यहीं से दवाओं को मनमानी कीमत पर बेचने का खेल शुरू होता है.

यही वो चोर दरवाजा है जिस रास्ते से आपकी हमारी जेब पर कैंची चलाई जा रही है. इस चोर दरवाजे के कारण सिपकाल की 15 टैबलेट का एक पत्ता कहीं टैक्स के साथ 25 रुपए का मिल रहा रहा है तो कहीं यही पत्ता 104 रुपए में बिक रहा है. जी मीडिया की टीम एक और दवा दुकान पर गई. हमें उम्मीद थी कि यहां दवा उचित कीमत पर मिलेगी. लेकिन यहां भी दवाएं हमें MRP पर ही मिलीं. हमने दुकानदार को बताया कि यही दवा हमें एक चौथाई कीमत पर मिली है. 

अधिक की चाह में आम आदमी को लूटा जा रहा है.  सिप्ला कंपनी के सिपकाल का जो पत्ता हमें होलसेल की दुकान पर टैक्स के साथ 25 रुपए का मिला था. वो इस दवा की दुकान पर 98 रुपए का मिला. MRP 104 रुपए है. दुकानदार ने दरियादिली दिखाते हुए 6 रुपए का भारी-भरकम डिस्काउंट दिया. सोचिए अगर कोई आम आदमी दवा खरीदने जाएगा तो वो सोचेगा कि मेडिकल शॉप वाले भैया कितने उदार हैं. 6 रुपए का डिस्काउंट दिया है. लेकिन असल में भैया ने 73 रुपए का मोटा मुनाफा कमाया है.

पैंटोसेक डी एस आर का एक पत्ता 142 रुपए.
सिपकाल का एक पत्ता 98 रुपए.
ओकामेट का एक पत्ता 26 रुपए का पड़ा.

जबकि होलसेल मार्केट में रेक्सकॉफ की एक बोतल हमें यहां 38 रुपए, पैंटोसेक डी एस आर का एक पत्ता 43 रुपए, सिपकाल का एक पत्ता 24 रुपए. ओकामेट का एक पत्ता 14 रुपए का पड़ा.

यानी हर दवा हमें करीब दोगुनी से चार गुनी कीमत में मिली. सवाल ये है कि जब सरकार ने कानून बनाया है. दवाईयों के दाम को कंट्रोल करने का नियम है. फिर आम आदमी से खुली लूट क्यों और कैसे हो रही है. इसे समझना बहुत जरूरी है. जब हम इस खामी को समझेंगे, तभी सही सवाल पूछेंगे और तभी इसका उपाय भी मिलेगा. सरकार ने 388 दवाओं और 1000 formulations को प्राइस कंट्रोल के दायरे में रखा है. यानी बाकी दवाएं जो कि दवा बाजार का 82 फीसदी हिस्सा है कंट्रोल के दायरे से बाहर हैं.

कैसे डलता है आपकी जेब पर डाका?

सरकार जिन दवाओं के दाम कंट्रोल करती है, दवा निर्माता वो दवा बनाना बंद कर देते हैं. उसी दवा के केमिकल कंपोजिशन में थोड़ा बदलाव कर दूसरी दवा बना देते हैं. दवा का नाम वही होगा. लेकिन अब ये प्राइस कंट्रोल के दायरे से बाहर होगी. इसलिए इसका मनमाना दाम वसूला जाएगा.

दूसरी चालाकी ये की जाती है कि अगर जीवन रक्षक दवा के 500MG वैरिएंट के दाम फिक्स किया गया है तो दवा निर्माता 650MG का वैरिएंट बाजार में लॉन्च कर देते हैं. इस तरह वो प्राइस कंट्रोल के दायरे से बाहर हो जाते हैं.

ये चालाकी दवा निर्माता करते हैं. लेकिन एक चालाकी जो रिटेलर करते हैं, जैसे सिपकाल के मामले में हुई, वो अब आप ध्यान से समझिएगा. दवाई की दुनिया में एक शब्द आता है: साल्ट. यानी दवा का केमिकल कंपोजिशन. तो जो ब्रांडेड दवा होती है, उसकी मार्केटिंग कंपनी करती है, इसलिए कंपनी पूरा मुनाफा लेती है. लेकिन कई दवाएं कंपनी जेनेरिक बनाती है. यानी एक ही केमिकल कंपोजिशन की दवाएं कई कंपनियां बनाती हैं. अब मेडिकल स्टोर वाला दवा MRP पर बेचता है तो पूरा मुनाफा उसकी जेब में जाता है. 

ये ठगी कितनी बड़ी है?

दवाओं की जरूरत हर आदमी को होती है. खांसी-बुखार जैसी छोटी बीमारी हो, तब भी हम दवा खरीदते हैं. यानी दवा वाली ठगी का शिकार हम सभी हो रहे हैं. 

देश में दवा का बाजार करीब 4 लाख 71 हजार 295 करोड़ रुपए का है. इसमें से बड़ा हिस्सा घरेलू बिक्री का है

आर्थिक सर्वे 2024-25 के मुताबिक देश में हेल्थ पर कुल खर्च 9 लाख 4 हजार 461 करोड़ रुपए का था. इसमें अस्पताल में इलाज और दवाओं का खर्च भी शामिल है. देश में हर व्यक्ति औसतन हेल्थ पर सालाना 6 हजार 602 रुपए खर्च करता है.

ये औसत खर्च है. आमतौर पर ये खर्च लाखों में होता है. इसमें से बड़ा हिस्सा लोग अपनी जेब से चुकाते हैं. यानी मेडिकल इंश्योरेंस में इलाज का बड़ा हिस्सा कवर नहीं होता है. 2021-22 में करीब 40 फीसदी लोगों ने इलाज का खर्च अपनी जेब से चुकाया. दवाएं आमतौर पर इंश्योरेंस का हिस्सा नहीं होती हैं. इसलिए इनका खर्च मरीज को ही उठाना होता है.  

दवाओं की कीमत कैसे बढ़ती है सरकार ने इसका भी एक फॉर्मूला फिक्स किया है. अप्रैल 2025 में सरकार ने एक फॉर्मूला तय किया.

जीवनरक्षक दवाओं के दाम महंगाई इंडेक्स के मुताबिक 1.74 फीसदी तक बढ़ाने की इजाजत दी गई.

ये 2025 में तय हुआ. लेकिन उससे पहले 2022 में जीवनरक्षक दवाओं के दाम करीब 11 फीसदी बढ़े थे. 2023 में करीब 12 फीसदी दाम बढ़े थे.

Non-Scheduled दवाओं के दाम हर साल 10 फीसदी तक बढ़ाने की इजाजत होती है. लेकिन मार्च 2025 तक 307 ऐसी शिकायतें थीं जहां कंपनियों ने इन दवाओं की कीमत 10 फीसदी से ज्यादा बढ़ाई थी.

समझिए दवा के दाम हर साल करीब 10 फीसदी से ज्यादा बढ़ते हैं लेकिन आम आदमी की आदमनी हर साल बमुश्किल 7 से 8 फीसदी तक बढ़ती है.

भारतीय जन औषधि केंद्र

यानी दवा कंपनियां ही नियम का पालन नहीं करती हैं. इसलिए दवाएं सिर्फ महंगी नहीं हुई हैं. बहुत महंगी हो गई हैं. हमारे संवाददाता एक और दुकान पर गए. वहां उन्हें कितने दाम पर दवाएं मिलीं.

आपको ये पता होना चाहिए कि आपके पास एक और ऑप्शन भी है. जन औषधि केंद्र. आम आदमी को ऐसी ही लूट से बचाने के लिए प्रधानमंत्री ने भारतीय जन औषधि केंद्र खोले हैं. हां, जेनरिक दवाएं बेची जाती हैं. ब्रांडेड दवाओं की तुलना में 50 से 90% कम कीमतों पर दवाएं यहां उपलब्ध होती हैं.

हम वहां गए तो जो दवा होलसेल में 23 रुपये की थी, रिटेल मार्केट में जिसे 104 रुपये में बेचा जा रहा था. वो हमें जन औषधि केंद्र में वही 1250 mg की कैल्शियम कार्बोनेट की गोली हमें 13 रुपये 41 पैसे में मिली है, यानी होलसेल रेट से भी कम में.

कैल्शियम कार्बोनेट की गोली का एक पत्ता आम दवा दुकान में 104 रुपये में मिल रहा है.वहीं इसी दवाई का ही पत्ता सरकारी दवा की दुकान, यानी जन औषधि केंद्र में 14 रुपये से कम में मिल रहा है.

जानते हैं जनऔषधि केंद्र पर दवाएं वाजिब कीमत पर क्यों मिलती है क्योंकि यहां दवाओं के दाम तय करने का एक नियम है.

यहां बिकने वाली दवाएं साल्ट की टॉप 3 ब्रांडेड दवाओं से औसतन 50 फीसदी कम होती हैं.
कुछ मामलों में जन औषधि केंद्र की दवाएं 90 फीसदी तक कम होती हैं.
एक रिसर्च के मुताबिक ब्रांडेड दवाओं की कीमत जन औषधि केंद्र पर बिकने वाली दवाओं से करीब 250% से भी ज्यादा रहता है.

इसलिए बाजार में जो दवा 104 रुपए की मिल रही थी. जो दवा होलसेल में 25 रुपए की मिल रही थी. वही दवा जन औषधि केंद्र पर हमें 14 रुपए में मिली. इसलिए दवाओं के कारोबार से जुड़े लोग भी कह रहे हैं कि आम आदमी के हित में जेनरिक दवाओं को बढ़ावा देना चाहिए .

दवा के नाम पर दो तरह की मुनाफाखोरी हो रही है. मरीज दो तरह से मर रहे हैं. मुनाफाखोरी यानी ज्यादा कीमत पर दवा बेची जा रही है. ऐसे में आम आदमी दवा नहीं खरीद पाता. दूसरी तरफ नकली दवाएं बेची जा रही है.

Bureau Report

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