पहले किन-किन मुद्दों पर नहीं बनी थी सहमति, अब ईरान-यूएस में कौन कितना झुका? जानें डील के सभी 14 प्वॉइंट्स

पहले किन-किन मुद्दों पर नहीं बनी थी सहमति, अब ईरान-यूएस में कौन कितना झुका? जानें डील के सभी 14 प्वॉइंट्स

मिडिल ईस्ट में लंबे समय से जारी तनाव के बीच अमेरिका और ईरान के बीच युद्ध समाप्त करने तथा होर्मुज जलडमरूमध्य को खोलने को लेकर एक महत्वपूर्ण सहमति बनने का दावा किया गया है. मध्यस्थता की भूमिका निभा रहे पाकिस्तान के अनुसार, इस समझौते पर 19 जून, शुक्रवार को स्विट्जरलैंड में औपचारिक हस्ताक्षर किए जा सकते हैं. मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, फिलहाल दोनों पक्ष युद्धविराम और समुद्री मार्गों को सामान्य करने जैसे मुद्दों पर सहमत हुए हैं. हालांकि, ईरान के परमाणु कार्यक्रम से जुड़े संवेदनशील विषयों पर बातचीत बाद के चरण में होने की संभावना है.

अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने सोशल मीडिया पर एक पोस्ट साझा करते हुए समझौते का स्वागत किया. उन्होंने सभी पक्षों को बधाई देते हुए कहा कि स्ट्रेट ऑफ होर्मुज को बिना किसी शुल्क के खोलने की अनुमति दी जा रही है. साथ ही उन्होंने अमेरिकी नौसेना की नाकेबंदी हटाने के निर्देश देने की भी बात कही. होर्मुज वैश्विक ऊर्जा आपूर्ति के लिहाज से बेहद महत्वपूर्ण समुद्री मार्ग माना जाता है. दुनिया के बड़े हिस्से में तेल निर्यात इसी रास्ते से होता है. ऐसे में इसके खुलने से अंतरराष्ट्रीय बाजारों में राहत की उम्मीद जताई जा रही है.

ईरान ने भी जताई सहमति

ईरान की ओर से भी इस समझौते को लेकर सकारात्मक संकेत मिले हैं. ईरान के उप-विदेश मंत्री काजेम गरीबाबादी ने सरकारी टेलीविजन पर प्रसारित बयान में समझौते की पुष्टि की है. हालांकि, समझौते के विस्तृत प्रावधानों को लेकर अभी आधिकारिक दस्तावेज सार्वजनिक नहीं किए गए हैं. एक्सपर्ट्स के मुताबिक यदि यह समझौता औपचारिक रूप से लागू हो जाता है, तो मिडिल ईस्ट में तनाव कम करने की दिशा में यह एक महत्वपूर्ण कदम साबित हो सकता है. साथ ही वैश्विक तेल बाजार और समुद्री व्यापार पर भी इसका सकारात्मक प्रभाव पड़ सकता है.

यूएस-ईरान डील: प्रस्तावित समझौते की 14 बड़ी बातें एक नजर में

  • ईरान के तेल, पेट्रोकेमिकल और उससे जुड़े निर्यात पर लगी अमेरिकी पाबंदियां हटाने का प्रस्ताव है.
  • तेहरान को अपने विदेशी वित्तीय संसाधनों और फंड तक दोबारा पूरी पहुंच मिल सकती है.
  • बातचीत की प्रक्रिया के दौरान ईरान के फ्रीज किए गए 24 अरब डॉलर जारी किए जाने की बात कही गई है.
  • इनमें से 12 अरब डॉलर शुरुआती चरण में ही जारी किए जाने का प्रस्ताव रखा गया है.
  • अमेरिका और उसके सहयोगी देशों से ईरान के पुनर्निर्माण के लिए करीब 300 अरब डॉलर की आर्थिक योजनाएं पेश करने की अपेक्षा की गई है.
  • लेबनान समेत क्षेत्र के विभिन्न संघर्ष क्षेत्रों में स्थायी युद्धविराम लागू करने की बात शामिल है.
  • अमेरिका से ईरान की संप्रभुता का सम्मान करने और उसके आंतरिक मामलों में हस्तक्षेप न करने की प्रतिबद्धता मांगी गई है.
  • ईरान पर लागू नौसैनिक नाकेबंदी को 30 दिनों के भीतर पूरी तरह हटाने का प्रस्ताव रखा गया है.
  • ईरान के आसपास तैनात अमेरिकी सैन्य मौजूदगी को कम करने या हटाने की बात भी दस्तावेज़ में शामिल बताई गई है.
  • रणनीतिक रूप से बेहद अहम होर्मुज जलडमरूमध्य को 30 दिनों के भीतर फिर से सामान्य आवाजाही के लिए खोलने की योजना है.
  • परमाणु कार्यक्रम और प्रतिबंधों से जुड़े लंबित मुद्दों के समाधान के लिए 60 दिनों की औपचारिक वार्ता शुरू करने का प्रस्ताव है.
  • ईरान परमाणु अप्रसार संधि (NPT) के तहत परमाणु हथियार विकसित न करने की अपनी प्रतिबद्धता दोहराएगा.
  • वार्ता अवधि के दौरान अमेरिका नई आर्थिक पाबंदियां लगाने या क्षेत्र में अतिरिक्त सैन्य बल तैनात करने से परहेज करेगा.
  • समझौते के पालन की निगरानी के लिए एक स्वतंत्र तंत्र बनाया जाएगा, जबकि अंतिम समझौते को संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद की मंजूरी दिलाने का प्रयास होगा.
  • ईरान का मिसाइल कार्यक्रम और क्षेत्रीय प्रतिरोध समूहों को उसका समर्थन इस प्रस्तावित समझौते के दायरे से बाहर रखा गया है.

सबसे अहम शर्त
रिपोर्ट के अनुसार, अंतिम दौर की औपचारिक बातचीत तभी शुरू होगी जब शुरुआती 12 अरब डॉलर जारी हो जाएं, तेल प्रतिबंधों में राहत मिल जाए और नौसैनिक नाकेबंदी समाप्त कर दी जाए.

इन शर्तों पर नहीं बनी थी ईरान-यूएस में सहमति

अमेरिका और ईरान के बीच सबसे बड़ी असहमति ईरान के परमाणु कार्यक्रम को लेकर रही है. दोनों देशों ने कई दौर की बातचीत की, लेकिन कुछ प्रमुख शर्तों पर सहमति नहीं बन सकी. ये मुख्य मुद्दे थे

1. यूरेनियम संवर्धन (Uranium Enrichment)

यह सबसे बड़ा विवाद था. अमेरिका चाहता था कि ईरान अपने देश में यूरेनियम संवर्धन (enrichment) को पूरी तरह बंद करे या बहुत सीमित रखे. ईरान का कहना था कि शांतिपूर्ण परमाणु ऊर्जा के लिए उसे संवर्धन का अधिकार है और वह इसे पूरी तरह बंद नहीं करेगा.

2. प्रतिबंधों (Sanctions) को हटाने का मुद्दा

ईरान चाहता था कि अमेरिका पहले तेल, बैंकिंग और व्यापार से जुड़े सभी प्रतिबंध हटाए. अमेरिका का रुख था कि प्रतिबंध तभी हटेंगे जब ईरान पहले परमाणु गतिविधियों पर ठोस और सत्यापित प्रतिबंध स्वीकार करे.

3. अंतरराष्ट्रीय निरीक्षण

अमेरिका और पश्चिमी देश चाहते थे कि International Atomic Energy Agency (IAEA) को ईरान के परमाणु ठिकानों तक व्यापक पहुंच मिले. ईरान सुरक्षा और संप्रभुता का हवाला देकर कुछ सैन्य स्थलों पर निरीक्षण का विरोध करता रहा.

4. मिसाइल कार्यक्रम

अमेरिका चाहता था कि ईरान अपने बैलिस्टिक मिसाइल कार्यक्रम पर भी सीमाएं स्वीकार करे. ईरान का कहना था कि उसकी मिसाइलें रक्षा के लिए हैं और इस विषय पर कोई समझौता नहीं होगा.

5. क्षेत्रीय प्रभाव और समर्थित समूह

अमेरिका ने ईरान पर आरोप लगाया कि वह क्षेत्रीय सशस्त्र समूहों को समर्थन देता है और इसे रोकना चाहिए. ईरान ने इसे अपनी क्षेत्रीय नीति का हिस्सा बताते हुए अमेरिकी मांगों को खारिज किया.

2015 के परमाणु समझौते (JCPOA) में क्या हुआ था?

2015 में हुए समझौते, जिसे Joint Comprehensive Plan of Action (JCPOA) कहा जाता है, के तहत ईरान ने यूरेनियम संवर्धन को 3.67% तक सीमित करने, अपने भंडार घटाने और अंतरराष्ट्रीय निरीक्षण स्वीकार करने पर सहमति दी थी. बदले में उस पर लगे कई अंतरराष्ट्रीय प्रतिबंध हटाए गए थे. बाद में 2018 में अमेरिका इस समझौते से बाहर निकल गया, जिसके बाद विवाद फिर बढ़ गया. संक्षेप में, इस डील में सबसे बड़ी रुकावटें ये थीं-  यूरेनियम संवर्धन, प्रतिबंध हटाने का क्रम, निरीक्षण व्यवस्था और मिसाइल कार्यक्रम. यही वे मुद्दे हैं जिन पर अमेरिका और ईरान लंबे समय से आम सहमति नहीं बना सके हैं.

Bureau Report

Be the first to comment

Leave a Reply

Your email address will not be published.


*