महाराष्ट्र में इस समय जो चल रहा, वो बहुत चौंकाता नहीं. कुछ दिनों पहले ही हम सबने लगभग ऐसी ही ‘सियासी फिल्म’ बंगाल में देखी थी. पटकथा वैसी ही है, बस किरदार बदले हुए हैं. 2022 में शिवसेना दो फाड़ हुई. उद्धव ठाकरे को मुख्यमंत्री पद छोड़ना पड़ा और फिर शुरू हुआ असली और नकली का खेल. हूबहू यही बंगाल में ममता दीदी की टीएमसी के साथ हुआ. अभी यूपी में कैबिनेट मंत्री ओमप्रकाश राजभर ने दावा कर दिया है कि सपा में भी बड़ी टूट होने वाली है. पहले बात महाराष्ट्र की कर लेते हैं.
2022 में उद्धव ठाकरे की शिवसेना पहले ही आधी हो चुकी है. कई कद्दावर नेता शिंदे की सरपरस्ती में आ गए. अब बीते कुछ दिनों से ‘ऑपरेशन टाइगर’ की चर्चा चल रही. दावा किया जा रहा कि उद्धव के कुल 9 सांसदों में से 6 पाला बदलने जा रहे. कल रात से सुगबुगाहट तेज है. पुणे में तो एक सांसद के लिए प्राइवेट प्लेन तक तैयार खड़ा था, जो उन्हें लेकर दिल्ली उड़ने वाला था. लेकिन पल-पल बदलते सियासी समीकरण के साथ उनका उड़ना भी टलता रहा.
मां भवानी की कसम क्या टूट जाएगी?
आजिज आकर उद्धव ने कल पार्टी सांसदों की बैठक बुलाई है. साथ ही चेतावनी भी दी गई है कि जो नहीं आएगा, उसको पार्टी से निकाल दिया जाएगा. संजय राउत ने 11 बजे प्रेस कॉन्फ्रेंस कर कहा कि हमारे सांसदों ने मां भवानी की कसम खाकर कहा है कि वे उद्धव के साथ ही रहेंगे. राउत ने बीजेपी का नाम लिए बगैर कहा कि चुने हुए सांसदों को खरीदना और पार्टी तोड़ना नई परंपरा शुरू हो गई है.
संजय राउत की मंशा कांग्रेस में विलय कराने की!
महाराष्ट्र में उद्धव गुट में टूट की अटकलों के बीच बीजेपी विधायक आशीषराव देशमुख ने एक ऐसा दावा कर दिया जो एक नजर में तो खारिज किया जा सकता है, लेकिन क्रोनोलॉजी देखें तो उनकी बातों में कुछ दम भी दिखता है. आशीषराव ने कहा है कि- ‘मैंने सुना है कि संजय राउत चाहते हैं कि UBT के सभी विधायक और सांसद कांग्रेस में शामिल हो जाएं. इससे शरद पवार को राज्यसभा में विपक्ष का नेता और उद्धव ठाकरे को महाराष्ट्र कांग्रेस का अध्यक्ष बनाया जाएगा. संजय राउत इस पर काम कर रहे हैं. मेरे पास पक्की जानकारी है कि संजय राउत की मंशा उद्धव ठाकरे की पार्टी और शरद पवार की पार्टी का कांग्रेस में विलय कराने की थी. लोग अब संजय राउत के रोज़ाना के बयानों को गंभीरता से नहीं लेते हैं.
क्षत्रप या तो टूटे या NDA में आ गए
अब थोड़ा पीछे चलते हैं. बीते कुछ बरसों में ये देश का एक सियासी ट्रेंड देखने में आ रहा कि छोटे दल या नेता बीजेपी में शामिल हो गए या फिर NDA को समर्थन दे दिए. मोदी सरकार के आने से पहले देश में क्षत्रप मजबूत स्थिति में थे. यूपी की बात करें तो सपा, बसपा मजबूत स्थिति में रहे. इसके अलावा टीएमसी, डीएमके, एआईएडीएमके, टीडीपी, आरजेडी, शिरोमणि अकाली दल, जेडीयू, शिवसेना, एनसीपी, बीजेडी, YSR से लेकर बीआरएस तक… सभी अपने-अपने राज्यों में ‘बादशाह’ थे. 2014 के बाद इन दलों में या तो टूट हो गई या फिर ये NDA में शामिल हो गए. अब कई दलों की हालत ये हो गई है कि उन्हें अपना वजूद बचाना भी मुश्किल लग रहा.
वजूद बचाने को क्या कांग्रेस ही एकमात्र सहारा?
मौजूदा राजनीति में बीजेपी के सामने कांग्रेस ही इकलौती पार्टी है जो कुछ नेताओं के जाने के बाद भी मुकाबले में दिख रही है. ऐसे में क्षत्रपों को अपना वजूद बचाने के लिए कांग्रेस की शरण में आना पड़ रहा. ऐसे में सवाल उठता है कि क्या भविष्य में बीजेपी के बरक्स देश में सिर्फ कांग्रेस पार्टी ही रहेगी जो NDA को चुनौती देगी? हालांकि अभी ऐसा कहना थोड़ा जल्दबाजी होगी, लेकिन अभी बंगाल और महाराष्ट्र में जो कुछ घटा या घट रहा, वो ही ऐसे सवालों को जन्म दे रहा.
2014 में जब एनडीए की सरकार बनी, तब ये कुनबा थोड़ा छोटा था. आज इस कुनबे के सदस्यों की संख्या लगातार बढ़ रही. 2014 में बीजेपी के चुनिंदा पुराने दोस्त NDA में आए. धीरे-धीरे NDA के परिवार में आंध्र प्रदेश से तेलुगु देशम पार्टी, बिहार से जेडीयू, पश्चिमी यूपी से राष्ट्रीय लोक दल और दक्षिण भारत से जनसेना शामिल हुई. ये सभी दल अपने-अपने राज्यों में बड़ा कद रखते हैं.
वहीं दूसरी ओर कुछ दल टूट कर एनडीए में चले आए. सबसे ज्यादा ये ‘टूट-फूट’ महाराष्ट्र में देखी गई. कभी उद्धव के सिपहसालार रहे एकनाथ शिंदे की निष्ठा बदली और उन्होंने 2022 में कई विधायकों के साथ अलग गुट बना लिया. अगले ही साल शरद पवार की राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी में बिखराव हुआ. शरद के भतीजे अजित दादा अपने समर्थकों के साथ शिंदे और देवेंद्र फडणवीस की अगुवाई वाली सरकार में शामिल हो गए.
ऑपरेशन लोटस Vs उपेच्छा-स्वेच्छा!
जिन राज्यों में क्षत्रपों का वर्चस्व रहा, वहां बीजेपी ने छोटे भाई की भूमिका में खुद को ढाला और फिर सही समय का इंतजार किया. बीजेपी के विरोधी दल अक्सर ‘ऑपरेशन लोटस’ का आरोप लगाते रहे हैं. वहीं बीजेपी का कहना है कि उनके साथ आए लोग अपनी पार्टियों में उपेक्षा और स्वेच्छा से आते हैं.
पिछले 12 सालों में बीजेपी ने चुनावी जीत के साथ-साथ गठबंधन विस्तार, विपक्षी दलों की टूट और नए सामाजिक-राजनीतिक समीकरणों को साधते हुए अपनी ताकत लगातार बढ़ाई है. इसी का नतीजा है कि आज वो दुनिया की सबसे बड़ी पार्टी का तमगा हासिल कर चुकी है.
यूपी में अब समाजवादी पार्टी के टूटने का नंबर?
अब महाराष्ट्र के बाद यूपी में भी कैबिनेट मंत्री ओमप्रकाश राजभर ने एक नया दावा कर सनसनी मचा दी है. उन्होंने दावा किया है कि टीएमसी और उद्धव की शिवसेना में टूट के बाद अब समाजवादी पार्टी का नंबर है. इसमें भी बड़ी टूट होने वाली है. उन्होंने बकायदा नाम लेकर कहा कि राम गोपाल ने अमित शाह को इस बाबत चिट्ठी लिख दी है.
Bureau Report
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