‘बॉस को दी अपनी किडनी, फिर भी कंपनी से मिला दर्द!’ रिकवरी की छुट्टियों पर महिला को नौकरी से निकाला

'बॉस को दी अपनी किडनी, फिर भी कंपनी से मिला दर्द!' रिकवरी की छुट्टियों पर महिला को नौकरी से निकाला

किसी की जान बचाने के लिए अपना अंग दान करना बहुत बड़ा फैसला होता है. अमेरिका की डेबी स्टीवंस नाम की महिला कर्मचारी ने भी ऐसा ही कदम उठाया था. उन्होंने अपनी बॉस जैकी ब्रूसिया की मदद करने के लिए किडनी डोनेट करने का फैसला लिया था.

यह मामला साल 2011 का है, लेकिन सोशल मीडिया पर एक बार फिर वायरल होने के बाद लोग इसे लेकर चर्चा कर रहे हैं. डेबी की कहानी में जहां इंसानियत और मदद की मिसाल दिखाई देती है, वहीं इसके बाद सामने आई घटनाओं ने लोगों को सोचने पर मजबूर कर दिया.

सीधा मैच नहीं हुआ, फिर भी नहीं पीछे हटीं डेबी

न्यूयॉर्क पोस्ट की रिपोर्ट के अनुसार रिपोर्ट्स के मुताबिक, डेबी की किडनी उनकी बॉस जैकी के लिए सीधे तौर पर मैच नहीं हो पाई थी. इसके बावजूद डेबी ने मदद करने का फैसला नहीं बदला. उन्होंने पेयर्ड किडनी एक्सचेंज प्रोग्राम में हिस्सा लिया. इस सिस्टम में अगर किसी डोनर की किडनी किसी खास मरीज से मैच नहीं होती, तो वह किसी दूसरे जरूरतमंद मरीज को अपनी किडनी दान कर सकता है. इसके बदले उस मरीज के लिए किसी दूसरे उपयुक्त डोनर से किडनी की व्यवस्था की जाती है. इसी प्रक्रिया के जरिए जैकी ब्रूसिया को भी एक उपयुक्त किडनी मिल सकी और उनका ट्रांसप्लांट संभव हो पाया. डेबी के इस फैसले की उस समय काफी तारीफ हुई थी. लेकिन कहानी का दूसरा हिस्सा काफी अलग था.

सर्जरी के बाद शुरू हुई परेशानी

किडनी दान करने के बाद डेबी को रिकवरी में कई परेशानियों का सामना करना पड़ा. सर्जरी के बाद शरीर को सामान्य होने में समय लगता है और डेबी को भी दर्द और स्वास्थ्य से जुड़ी दिक्कतों का सामना करना पड़ा. मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, डॉक्टरों की सलाह पर उन्हें आराम और छुट्टी की जरूरत पड़ी. लेकिन डेबी का आरोप था कि उनकी कंपनी और बॉस ने उनकी स्थिति को समझने के बजाय उनकी छुट्टियों को लेकर नाराजगी दिखाई. उनका कहना था कि जिस मदद के लिए उन्होंने अपनी सेहत को दांव पर लगाया, उसके बाद उन्हें ऑफिस में सहयोग नहीं मिला.

बॉस पर लगाए परेशान करने के आरोप

डेबी ने आरोप लगाया कि उनकी बॉस जैकी ब्रूसिया उनके साथ अच्छा व्यवहार नहीं कर रही थीं. उनका दावा था कि रिकवरी के दौरान छुट्टी लेने पर उन्हें ताने सुनने पड़े. डेबी के मुताबिक, उन्हें ऐसा महसूस कराया गया कि वह काम से बचने के लिए छुट्टियां ले रही हैं. उन्होंने यह भी आरोप लगाया कि ऑफिस में उनके लिए माहौल मुश्किल बना दिया गया. रिपोर्ट्स के अनुसार, बाद में उनका ट्रांसफर ऐसी जगह कर दिया गया, जो उनके घर से करीब 50 मील दूर थी. डेबी ने इसे भी अपने खिलाफ उठाया गया कदम बताया.

शिकायत के बाद चली गई नौकरी

जब डेबी ने अपने साथ हुए कथित व्यवहार की शिकायत की, तो मामला और बड़ा हो गया. उन्होंने कंपनी प्रबंधन और संबंधित अधिकारियों के सामने अपनी बात रखी. डेबी का आरोप था कि शिकायत करने के बाद उन्हें नौकरी से निकाल दिया गया. इसके बाद उन्होंने इस फैसले को चुनौती दी और मामला कानूनी लड़ाई तक पहुंच गया. यह मामला उस समय अमेरिका में काफी चर्चा में रहा था. कई लोगों ने इसे वर्कप्लेस पर कर्मचारियों के साथ व्यवहार और अधिकारों से जोड़कर देखा.

कोर्ट पहुंचा मामला, फिर हुआ समझौता

डेबी और कंपनी के बीच कानूनी प्रक्रिया लंबे समय तक चली. आखिरकार साल 2014 में दोनों पक्षों के बीच एक गोपनीय समझौता हुआ. इस समझौते की पूरी जानकारी सार्वजनिक नहीं की गई. इसके बाद मामला खत्म हो गया और दोनों पक्षों ने इस विवाद को आगे नहीं बढ़ाया.

सोशल मीडिया पर फिर क्यों हो रही चर्चा?

पुराने मामले के दोबारा वायरल होने के बाद लोग इसे लेकर अलग-अलग राय दे रहे हैं. कुछ लोगों का कहना है कि डेबी ने जो किया, वह इंसानियत की बड़ी मिसाल थी और उनके साथ संवेदनशील व्यवहार होना चाहिए था. वहीं, कुछ लोग मानते हैं कि किसी भी वर्कप्लेस मामले में दोनों पक्षों की पूरी बात सामने आना जरूरी है. यह कहानी आज भी इसलिए चर्चा में है क्योंकि इसमें एक तरफ किसी की जिंदगी बचाने के लिए किया गया त्याग है, तो दूसरी तरफ नौकरी और रिश्तों से जुड़ा विवाद. डेबी स्टीवंस का मामला यह सवाल जरूर खड़ा करता है कि किसी कर्मचारी की मदद और समर्पण की कद्र वर्कप्लेस पर कितनी होनी चाहिए. आखिर इंसानियत और पेशेवर जिम्मेदारियों के बीच संतुलन बनाना हर संस्था के लिए जरूरी है.

Bureau Report

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