‘मुसलमानों को वोट बैंक और शो ब्वॉय बनाकर रख दिया’, बीजेपी-कांग्रेस पर जमकर बरसे ओवैसी

'मुसलमानों को वोट बैंक और शो ब्वॉय बनाकर रख दिया', बीजेपी-कांग्रेस पर जमकर बरसे ओवैसी

AIMIM चीफ असदुद्दीन ओवैसी ने बीजेपी और कांग्रेस पर जमकर हमला बोला. मंगलवार को एक कार्यक्रम में ओवैसी ने कहा कि BJP और कांग्रेस दोनों ही मुसलमानों को अहम राजनीतिक नुमाइंदगी दिलाने में नाकाम रही हैं. उन्होंने आरोप लगाया कि एक के बाद एक आई सरकारों ने इस समुदाय को बराबरी का राजनीतिक हिस्सेदार मानने के बजाय सिर्फ वोट बैंक और ‘शो-ब्वॉय’ बनाकर रख दिया है.

हैदराबाद के सांसद ने कहा कि भारत में कोई भी राजनीतिक पार्टी नहीं चाहती कि मुसलमानों की अपनी स्वतंत्र राजनीतिक पहचान और ताकत हो. उन्होंने आरोप लगाया कि जो पार्टियां खुद को धर्मनिरपेक्ष (सेक्युलर) बताती हैं, उनमें भी अल्पसंख्यकों के हक में खड़े होने और उन्हें राजनीतिक रूप से सशक्त बनाने की ‘बौद्धिक ईमानदारी’ की कमी है.

ओवैसी ने सियासी दलों पर बोला हमला

दरअसल, ओवैसी से पूछा गया था कि क्या भारत अल्पसंख्यकों के हितों की रक्षा के लिए पर्याप्त कदम उठा रहा है. उन्होंने कहा कि देश के संस्थापकों ने एक ऐसी संवैधानिक व्यवस्था की कल्पना की थी, जिसमें राज्य का कोई धर्म नहीं होगा और सभी नागरिकों को समान अधिकार मिलेंगे.

उन्होंने आरोप लगाया, ‘संस्थापकों ने हमें संविधान दिया. इस देश का कोई धर्म नहीं होगा. मौलिक अधिकार दिए गए, समानता दी गई. लेकिन जिन पार्टियों ने भारत पर शासन किया, उन्होंने हमें राजनीतिक रूप से हाशिए पर धकेल दिया, हमारी ताकत छीन ली, हमें आगे नहीं बढ़ने दिया और हमें राजनीतिक न्याय से वंचित रखा.’

‘वोट सबने मांग, हक किसी ने नहीं दिया’

ओवैसी ने कहा कि मुसलमानों के राजनीतिक रूप से हाशिए पर होने की समस्या के लिए किसी एक सरकार या पार्टी को जिम्मेदार नहीं ठहराया जा सकता, क्योंकि एक के बाद एक आई सरकारें इस समुदाय को ठोस नुमाइंदगी दिलाने में नाकाम रही हैं. उन्होंने तर्क दिया, ‘नेहरू से लेकर मोदी तक, मुसलमानों को सिर्फ वोटर बनाया गया है, बराबरी का हिस्सेदार नहीं.’

ओवैसी ने संसद में मुसलमानों के प्रतिनिधित्व पर सवाल उठाते हुए कहा कि ये आंकड़े भारत की लोकतांत्रिक व्यवस्था में समुदाय की जगह पर सवाल खड़े करते हैं. उन्होंने पूछा, ‘भारतीय संसद में मुसलमानों का प्रतिनिधित्व 4 प्रतिशत है. क्या यह हमारे लोकतंत्र के बारे में बहुत कुछ नहीं कहता? आपकी आबादी 18 करोड़ है और चुने हुए प्रतिनिधि सिर्फ 4 प्रतिशत हैं?’

उन्होंने कहा कि मुद्दा सिर्फ मुस्लिम सांसदों की संख्या का नहीं है, बल्कि इस बात का है कि क्या मुसलमानों को अपनी स्वतंत्र राजनीतिक आवाज और ताकत तैयार करने का मौका दिया गया है.

‘सबके पास सियासी ताकत, मुसलमानों के पास नहीं’

ओवैसी ने पूछा, ‘मेरी राजनीतिक आवाज कहां है? मेरी राजनीतिक ताकत कहां है?’ उन्होंने बताया कि कई अन्य सामाजिक समूह राजनीतिक अगुआई और प्रतिनिधित्व के संस्थान बनाने में सफल रहे हैं, जबकि मुसलमानों को ऐसा मौका नहीं दिया गया. आपने वह राजनीतिक ताकत क्यों नहीं बनाई, जबकि ब्राह्मणों, ठाकुरों, नायर और लगभग हर समुदाय के पास यह है? यहां तक कि दलितों के पास भी है, लेकिन मुसलमानों को इससे दूर रखा गया है.’

AIMIM प्रमुख ने तर्क दिया कि मुसलमानों से मुख्य रूप से सिर्फ वोट देने वाले समूह के तौर पर चुनाव में हिस्सा लेने की उम्मीद की जाती थी, न कि राजनीतिक फैसले लेने में उनकी कोई स्वतंत्र भूमिका होती थी.

कोच्चि में उन्होंने कहा, ‘आपसे कहा जाता है कि बस वोट दें और सब कुछ सहें. चाहे वह बुलडोजर हो, मस्जिद का मुद्दा हो या एनकाउंटर. लेकिन जब चुनाव आते हैं, तो आप उन्हीं लोगों को वोट देते हैं जिन्होंने आपको हाशिए पर धकेला है.’

सेक्युलर पार्टियों पर करारा प्रहार

ओवैसी ने जहां एक ओर BJP को अपने उम्मीदवारों में मुसलमानों के प्रतिनिधित्व को लेकर निशाना बनाया, वहीं दूसरी ओर खुद को धर्मनिरपेक्ष बताने वाली पार्टियों की भी आलोचना की. उन्होंने आरोप लगाया कि वोट मांगने के बावजूद ये पार्टियां मुसलमानों को राजनीतिक रूप से सशक्त बनाने में नाकाम रही हैं. उन्होंने कहा, ‘दूसरी तथाकथित धर्मनिरपेक्ष पार्टियों ने मुसलमानों को सिर्फ वोटर और दिखावे के लिए इस्तेमाल होने वाले लोगों (शो-बॉय) तक सीमित कर दिया है.’

सांसद ने सवाल उठाया कि मुसलमानों के पास क्या राजनीतिक विकल्प बचता है, अगर BJP उन्हें पर्याप्त प्रतिनिधित्व नहीं देती और खुद को धर्मनिरपेक्ष बताने वाली पार्टियां स्वतंत्र मुस्लिम राजनीतिक नेतृत्व को जगह देने को तैयार नहीं हैं. उन्होंने कहा कि राजनीतिक प्रतिनिधित्व को सामाजिक और आर्थिक सशक्तिकरण के मुद्दों से अलग नहीं किया जा सकता.

‘मुसलमानों ने कम बुरी पार्टी को चुना’

जब उनसे पूछा गया कि क्या मुसलमान पारंपरिक रूप से कांग्रेस को वोट देते रहे हैं, तो ओवैसी ने इस बात को खारिज कर दिया कि इस तरह की वोटिंग का मतलब पार्टी के प्रति बिना शर्त राजनीतिक पसंद था. उन्होंने कहा, ‘मुसलमानों ने दो बुराइयों में से कम बुरी पार्टी को चुना.कोई दूसरा व्यावहारिक विकल्प नहीं था.’

उन्होंने तर्क दिया कि व्यावहारिक विकल्पों की कमी के कारण मुसलमानों को स्वतंत्र राजनीतिक मंच बनाने और उनका समर्थन करने के बजाय स्थापित राजनीतिक दलों में से किसी एक को चुनने के लिए मजबूर होना पड़ा.

ओवैसी ने कांग्रेस पर यह आरोप भी लगाया कि वह समुदाय का चुनावी समर्थन तो चाहती है, लेकिन स्वतंत्र मुस्लिम राजनीतिक नेतृत्व के उभरने का विरोध करती है. उन्होंने तर्क दिया कि धर्मनिरपेक्षता केवल चुनावी नारा नहीं हो सकती और जो दल इसे बनाए रखने का दावा करते हैं, उन्हें अल्पसंख्यकों के राजनीतिक सशक्तिकरण के माध्यम से अपनी प्रतिबद्धता दिखानी चाहिए.

ओवैसी ने कहा, ‘जो दल खुद को धर्मनिरपेक्ष कहते हैं, उनमें अल्पसंख्यकों के साथ खड़े होने और उन्हें सशक्त बनाने की बौद्धिक ईमानदारी नहीं है.’ उन्होंने कहा कि वास्तविक राजनीतिक प्रतिनिधित्व के लिए यह जरूरी है कि भारत की लोकतांत्रिक व्यवस्था में विभिन्न समुदायों की अपनी आवाज़ हो, न कि उन्हें केवल चुनावी वोट बैंक के तौर पर देखा जाए.

Bureau Report

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