चुनाव आयोग ने वोटर लिस्ट से नाम हटाने के लिए दायर किए जाने वाले फॉर्म-7 को लेकर बड़ा फैसला लिया है. आयोग ने एक शख्स की ओर से थोक में आपत्तियां दाखिल करने पर रोक लगाने के लिए नई सीमा तय कर दी है. इस संबंध में आयोग ने सभी राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों के मुख्य चुनाव अधिकारियों को आदेश जारी किए हैं.
आयोग ने आदेश में कहा कि उसके संज्ञान में ऐसे मामले आए हैं जहां व्यक्तिगत मतदाताओं की ओर से बिना ठोस आधार के थोक में फॉर्म-7 के तहत आपत्तियां दर्ज की जा रही हैं. इससे जिन मतदाताओं पर आपत्ति की गई है, उन्हें बेकार में असुविधा हो रही है और फील्ड स्तर के अधिकारियों पर काम का बोझ भी बढ़ रहा है.
क्या है चुनाव आयोग का नियम?
आयोग के मुताबिक, निर्वाचक रजिस्ट्रीकरण नियम 1960 के नियम 13(2) के तहत किसी निर्वाचन क्षेत्र की वोटर लिस्ट में नाम शामिल करने पर आपत्ति या नाम हटाने का आवेदन फॉर्म-7 में होना चाहिए और वह केवल उसी शख्स की ओर से किया जा सकता है जिसका नाम पहले से उसी इलाके की लिस्ट में हो.
चुनाव आयोग ने बताया कि एसआईआर पीरियड के लिए मान्यता प्राप्त राजनीतिक दलों के बीएलए को थोक में आवेदन देने की इजाजत है, लेकिन उनके लिए भी सीमा तय है. बीएलए ड्राफ्ट पब्लिश से पहले एक दिन में बीएलओ को 50 से ज्यादा फॉर्म और उसके बाद 10 से अधिक फॉर्म जमा नहीं कर सकता.
वहीं व्यक्तिगत मतदाता के लिए वोटर लिस्ट मैनुअल 2023 में पहले से प्रावधान है कि किसी एक शख्स की ओर से थोक में पेश किए गए दावे-आपत्तियां, जिनमें डाक से भेजे गए आवेदन भी शामिल हैं, स्वीकार नहीं किए जाने चाहिए. अगर एक ही शख्स पांच से ज्यादा मामलों में आपत्तिकर्ता बनता है तो ईआरओ को व्यक्तिगत रूप से क्रॉस-वेरिफिकेशन करना होता है.
6 बार ही कर सकता है आवेदन
आयोग ने कहा कि ऑनलाइन माध्यम में एक शख्स एक बार में 6 आवेदन ही कर सकता है, लेकिन फिजिकल फॉर्म की संख्या डिफाइन नहीं थी और यह ईआरओ के विवेक पर छोड़ दिया गया था, जिससे परेशानी हो रही थी. इसी को देखते हुए आयोग ने नई सीमा तय की है. अब दावे और आपत्तियों की पूरी अवधि के दौरान कोई एक मतदाता अधिकतम 10 फॉर्म-7 ही दाखिल कर सकेगा. वहीं, वोटर लिस्ट के लगातार अपडेट के दौरान यह सीमा हर महीने 5 आवेदन की होगी. यह नियम ऑनलाइन और ऑफलाइन दोनों पर लागू होगा.
आयोग ने यह भी साफ किया है कि नियम 17 के तहत अधूरे या तय प्रारूप में नहीं भरे गए आवेदनों को ईआरओ खारिज कर देगा. फॉर्म-7 पर आपत्तिकर्ता के मूल हस्ताक्षर जरूरी होंगे, मोहर से काम नहीं चलेगा. साथ ही ईआरओ को आवेदक की प्रामाणिकता की जांच करनी होगी.
अगर शिकायत झूठी या मनगढ़ंत पाई गई तो लोक प्रतिनिधित्व अधिनियम 1950 की धारा 31 के तहत जानबूझकर झूठा बयान देने वाले आवेदक के खिलाफ कार्रवाई की जाएगी.
Bureau Report
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