असम, मध्य प्रदेश, राजस्थान, छत्तीसगढ़ समेत कई राज्यों में अपने ही नेताओं की नाराजगी झेलने वाली कांग्रेस कई साल बाद अब बदलती दिख रही है. हां, केरलम में जिस तरह मुख्यमंत्री का सिलेक्शन हुआ, वह इस बदलाव का प्रमाण है. आमतौर पर कांग्रेस में हाईकमान ही फैसले लेता रहा है. सीएम दिल्ली में तय किए जाते हैं, लेकिन केरलम में जिस तरह जनभावना और स्थानीय नेताओं की डिमांड को महसूस करते हुए कम अनुभवी वीडी सतीशन को प्रमोट किया गया, उसकी तारीफ हो रही है. हां, अगर पुरानी वाली कांग्रेस की सोच होती तो विधायकों की खेमेबाजी और राहुल गांधी के करीबी होने के कारण केसी वेणुगोपाल को मुख्यमंत्री बनाया जा सकता था. जबकि, सहयोगी दलों, स्थानीय वरिष्ठ नेताओं और पिछले पांच साल के कार्यों पर गौर करते हुए बारीक फैसला लिया गया. अब कुछ वैसे ही संकेत कर्नाटक में दिख रहे हैं.
जिस वजह से कई राज्यों में पार्टी के नेताओं में अनबन चली, उसका खामियाजा कांग्रेस को ही भुगतना पड़ा. नेता के जाने से नॉर्थ ईस्ट छिन गया. सरकार गिर गई. सत्ता बदल गई. अब कांग्रेस कर्नाटक में यह दोहराना नहीं चाहती है शायद इसीलिए सीएम सिद्धारमैया का इस्तीफा होने जा रहा है. उन्हें दिल्ली बुलाकर राज्य की कमान तेजतर्रार और गांधी परिवार के वफादार डीके शिवकुमार को सौंपने की तैयारी है. काफी समय से कर्नाटक से यह मांग उठ रही है.
न चहेते का मोह, न वरिष्ठता का प्रेशर
हां, कई साल से कांग्रेस को लेकर यह आम धारणा बन गई थी कि आलाकमान अपने चहेते वरिष्ठ नेताओं के मोह से निकल नहीं पा रहा है. यही वजह है कि नई पीढ़ी और अपेक्षाकृत युवा चेहरों को मौका नहीं मिल रहा है. इसका पार्टी ने खामियाजा भी भुगता. कई नेता भाजपा में चले गए और आज शीर्ष पद पर हैं. हालांकि, कर्नाटक का केस थोड़ा अलग है.
कर्नाटक में संभलकर चली कांग्रेस
2023 में जीत मिलने के बाद कांग्रेस ने क्षेत्रीय नेता को सशक्त बनाया. दिल्ली हाईकमान की तरफ से सीएम थोपने की बजाय, जनता के बीच लोकप्रिय क्षेत्रीय नेता पर भरोसा जताया गया. सिद्धारमैया पिछड़े वर्गों, दलितों और अल्पसंख्यकों (AHINDA गठबंधन) के बीच एक मजबूत पकड़ रखते हैं. डीके शिवकुमार ने संगठन में अहम भूमिका निभाई थी. ऐसे में राज्य से आने वाले कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे ने आम सहमति वाला रास्ता अपनाया. सभी गुटों को साधा और वरिष्ठता को पहले मौका दिया. अब धीरे से सीन बदलने की तैयारी है. मौका युवा को देना है.
केरलम में कांग्रेस ने क्या नया किया?
दरअसल, वीडी सतीशन के नाम की घोषणा से पहले जिस तरह से केसी वेणुगोपाल का नाम आगे आया था, गांधी परिवार से उनकी करीबी के चलते लोग मानकर बैठे थे कि कांग्रेस में वही होगा, जो होता आया है. हालांकि, सतीशन को सीएम बनाकर कांग्रेस ने जमीनी कार्यकर्ताओं को महत्व देने, युवा और मुखर नेतृत्व को आगे बढ़ाने का मैसेज दिया. गुटबाजी को दूर रखने का सख्त मैसेज था. भाजपा इसी फॉर्मूले के दम पर विजय हासिल करती आ रही है.
अगर कांग्रेस दिल्ली में ज्यादा एक्टिव रहने वाले वेणुगोपाल को चुनती तो वह ‘दिल्ली नेतृत्व के लिए सीएम’ बनकर रह जाते, लेकिन जमीनी नेता को चुनने से पूरे राज्य में यह संदेश गया कि मेहनत को सम्मान मिलता है. केरलम में कोई वरिष्ठता के लिए दावा कर रहा था, तो कोई घनिष्ठता के लिए लेकिन कांग्रेस ने साफ-सुथरी छवि वाले नेता को आगे किया. इंडियन यूनियन मुस्लिम लीग-जैसे सहयोगी दल भी सतीशन के सपोर्ट में थे. ऐसे में भाजपा भले ही कुछ कहे, कांग्रेस ने गठबंधन में आपसी विश्वास और तालमेल का संदेश दिया है. यह केरलम में कांग्रेस को मजबूत करने की एक सोची-समझी रणनीति का हिस्सा हो सकता है.
अब कांग्रेस आलाकमान ने कर्नाटक में भी पिछले चुनाव नतीजों के प्रभाव से निकलकर भविष्य की रणनीति के हिसाब से तैयारी शुरू कर दी है. और भविष्य डीके शिवकुमार हैं. कुछ लोग कह रहे हैं कि देर से ही सही, कांग्रेस कम से कम बदल तो रही है.
Bureau Report
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