Single Teacher Schools in India: देश के 1 लाख से ज्यादा स्कूल सिर्फ एक शिक्षक के भरोसे, बड़ा खुलासा!

Single Teacher Schools in India: देश के 1 लाख से ज्यादा स्कूल सिर्फ एक शिक्षक के भरोसे, बड़ा खुलासा!

नई शिक्षा नीति (NEP 2020) और शिक्षा का अधिकार (RTE) कानून देश में हर बच्चे को बेहतर और समान शिक्षा देने के लक्ष्य पर आधारित है. हालांकि, जमीनी हकीकत कुछ और ही कहानी बयां करती है. संसद में पेश किए गए ताजा आंकड़ों के मुताबिक देश में 1,00,843 स्कूल ऐसे हैं, जहां पूरे स्कूल की जिम्मेदारी सिर्फ एक शिक्षक पर है. ऐसे लाखों स्कूल हैं जहां पर सिर्फ एक शिक्षक बच्चों को पढ़ाता भी है, स्कूल का रिकॉर्ड भी संभालता है, सरकारी योजनाओं का काम भी देखता है और प्रशासनिक जिम्मेदारियां भी निभाता है.

लाखों स्कूलों में सिर्फ एक शिक्षक की होने की जानकारी राज्यसभा में शिक्षा मंत्रालय ने सांसद रणदीप सिंह सुरजेवाला के सवाल के लिखित जवाब में दी गई. आंकड़े UDISE+ 2025-26 के हैं जिनमें सरकारी, सहायता प्राप्त और निजी स्कूल शामिल हैं.

अलग-अलग कक्षाओं की क्लास एक साथ 

सिंगल टीचर स्कूल ऐसे स्कूल होते हैं, जहां पूरे संस्थान में केवल एक नियमित शिक्षक कार्यरत होता है. चाहे स्कूल में एक कक्षा हो या कई कक्षाएं, सभी छात्रों की पढ़ाई उसी एक शिक्षक के भरोसे चलती है. कई जगहों पर एक ही कमरे में अलग-अलग कक्षाओं के बच्चों को एक साथ पढ़ाया जाता है. ऐसी स्थिति में शिक्षक को अलग-अलग विषयों की पढ़ाई कराने के साथ-साथ स्कूल के दैनिक प्रशासनिक कार्य भी संभालने पड़ते हैं. इससे पढ़ाई की क्वालीटी प्रभावित होने का खतरा बढ़ जाता है.

किन राज्यों में सबसे ज्यादा सिंगल टीचर वाले स्कूल?

शिक्षा मंत्रालय के अनुसार सबसे अधिक सिंगल टीचर स्कूल कुछ बड़े राज्यों में हैं. आंध्र प्रदेश इस सूची में सबसे ऊपर है. इसके बाद झारखंड, महाराष्ट्र, कर्नाटक, उत्तर प्रदेश, राजस्थान और पश्चिम बंगाल का स्थान आता है. इन राज्यों में हजारों स्कूल ऐसे हैं, जहां सिर्फ एक शिक्षक पूरे स्कूल का संचालन कर रहा है. एक्सपर्ट के अनुसार पहाड़ी, आदिवासी और दूरदराज के क्षेत्रों में ये समस्या ज्यादा दिखाई देती है, जहां नए शिक्षकों की नियुक्ति और तैनाती चुनौतीपूर्ण होती है.

आखिर ये स्थिति क्यों बनी?

शिक्षा मंत्रालय ने बताया कि कई कारणों से कुछ स्कूलों में सिर्फ एक शिक्षक रह जाता है. इनमें शिक्षकों का रिटायर्ड होना, ट्रांसफर, इस्तीफा, नए पदों पर समय पर भर्ती न होना और विभिन्न क्षेत्रों में छात्रों की संख्या में बदलाव प्रमुख कारण हैं. हालांकि, शिक्षकों की नियुक्ति राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशों की जिम्मेदारी है, लेकिन केंद्र सरकार समग्र शिक्षा योजना के तहत वित्तीय सहायता उपलब्ध कराती है और समय-समय पर रिक्त पद भरने की सलाह भी देती है.

क्या नई शिक्षा नीति के सामने चुनौती है?

नई शिक्षा नीति का उद्देश्य सिर्फ स्कूलों में बच्चों का एडमिशन बढ़ाना नहीं, बल्कि उन्हें गुणवत्तापूर्ण शिक्षा देना भी है. नीति में बुनियादी साक्षरता, एक्शन आधारित शिक्षण, व्यक्तिगत सीखने और बेहतर छात्र-शिक्षक अनुपात पर जोर दिया गया है, लेकिन जब एक शिक्षक को कई कक्षाओं और प्रशासनिक जिम्मेदारियों का बोझ एक साथ उठाना पड़ता है, तब इन लक्ष्यों को पूरी तरह हासिल करना आसान नहीं होता. विशेषज्ञों का कहना है कि अगर प्रत्येक स्कूल में पर्याप्त शिक्षक उपलब्ध नहीं होंगे तो सीखने के परिणामों पर असर पड़ सकता है.

आगे का रास्ता क्या हो सकता है?

शिक्षा विशेषज्ञों के अनुसार इस समस्या से निपटने के लिए खाली पदों पर तेजी से भर्ती, ग्रामीण और दूरदराज क्षेत्रों में शिक्षकों की नियमित तैनाती, ट्रांसपेरेंट ट्रांसफर पॉलिसी और स्कूलों में जरूरी संसाधनों की उपलब्धता पर खास ध्यान देना होगा. इसके अलावा जहां छात्र संख्या बढ़ रही है वहां अतिरिक्त शिक्षकों की नियुक्ति भी जरूरी है.

Bureau Report

Be the first to comment

Leave a Reply

Your email address will not be published.


*