UPI Levy: चाय की दुकान से लेकर शॉपिंग मॉल तक हर जगह डिजिटल पेमेंट के जरिये चुटकियों में पेमेंट करना संभव हो पाया है. अब सरकार ने डिजिटल पेमेंट से जुड़े कानून में संशोधन का प्रस्ताव दिया है. यह प्रस्ताव ऐसे समय में आया है जब सरकार अमेरिका के साथ ट्रेड डील को लेकर बातचीत आगे बढ़ा रही है. केंद्र सरकार की तरफ से संसद में टैक्सेशन एंड अदर लॉज (अमेंडमेंट) बिल, 2026 पेश किया गया. इस बिल में पेमेंट एंड सेटलमेंट सिस्टम्स एक्ट, 2007 की धारा 10A में बदलाव का प्रस्ताव है. यदि यह कानून लागू हुआ तो बैंक और पेमेंट सर्विस प्रोवाइडर UPI और RuPay डेबिट कार्ड ट्रांजेक्शन पर चार्ज वसूल सकेंगे.
आने वाले समय में यूपीआई पेमेंट पर मर्चेंट डिस्काउंट रेट यानी एमडीआर (MDR) को फिर से लागू किया जा सकता है. सरकार ने साल 2020 में डिजिटल पेमेंट को बढ़ावा देने और कैशलेस इकोनॉमी को मजबूत करने के लिए UPI और रुपे डेबिट कार्ड ट्रांजेक्शन पर एमडीआर (MDR) को जीरो कर दिया था. लेकिन सरकार अब 2020 से पहले वाले नियम को फिर से लागू करने की तैयारी कर रही है. अमेरिका से डील पर बातचीत के बीच सरकार ने संसद में यह बिल पेश किया है. पहली नजर में दोनों घटनाक्रम अलग-अलग लगे लेकिन इसके अमेरिकी कनेक्शन पर भी बात की जा रह है.
अमेरिकी कंपनियों को मौका देने की दलील
ट्रंप प्रशासन लंबे समय से अपने ट्रेड पार्टनर्स पर इस बात को लेकर दबावा बना रहा है कि डिजिटल पेमेंट सिस्टम में अमेरिकी कंपनियों को बराबर का मौका मिलना चाहिए. ऐसे में यह सवाल लाजिमी है कि सरकार इस प्रस्ताव के जरिये डिजिटल पेमेंट सिस्टम को आर्थिक रूप से मजबूत करना चाहती है या इसके पीछे और कोई कारण है? यूजर्स यूपीआई को इसलिए ज्यादा पसंद कर रहे हैं क्योंकि इसे यूज करना आसान और फ्री है. नए बदलाव के बाद बैंक और पेमेंट सर्विस प्रोवाइडर कंपनियां यूपीआई और रुपे पर चार्ज लगा सकती हैं.
UPI पर क्यों शुरू हुई बहस?
सरकार की तरफ से पेश संशोधन का मकसद बैंक और फिनटेक कंपनियों को डिजिटल पेमेंट इंफ्रास्ट्रक्चर में निवेश के लिए इंफ्रास्ट्रक्चर मुहैया कराना बताया जा रहा है. अभी UPI और RuPay डेबिट कार्ड के ज्यादातर पेमेंट पर MDR जीरो है. यानी व्यापारी इस पर किसी तरह का एक्स्ट्रा चार्ज नहीं देते. लेकिन संसद में पेश प्रस्ताव को मंजूरी मिली तो पेमेंट सर्विस प्रोवाइडर कंपनियों को MDR लागू करने का राइट मिल सकता है. वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने साफ किया कि यह चार्ज व्यापारियों पर ही लागू होगा, आम ग्राहकों से इससे मतलब नहीं है.
UPI पर ट्रंप की तिरछी नजर?
भारत और अमेरिका के बीच ट्रेड डील (Trade Deal) पर चल रही बातचीत के दौरान अमेरिकी प्रशासन की तरफ से लगातार यह मामला उठाया जा रहा है कि भारत का डिजिटल पेमेंट स्ट्रक्चर विदेशी कंपनियों को बराबर का मौका नहीं देता. यूपीआई को भारत में साल 2016 में शुरू किया गया था. इसके शुरू होने के बाद से अमेरिकी कंपनियां वीजा (Visa) और मास्टरकार्ड (Mastercard) अपने बिजनेस में गिरावट की बात कह रहे हैं. ग्लोबल ट्रेड रिसर्च इनीशिएटिव की तरफ से बताया गया कि ये कंपनियां यूपीआई और रुपे पर जीरो ट्रांजेक्शन फीस और यूपीआई के जरिये क्रेडिट कार्ड पेमेंट में रुपे को पहले मिलने वाले मौके को लेकर हमेशा विरोध करती रही हैं.
अमेरिका का क्या है तर्क
अमेरिका बार-बार यही कह रहा है कि भारत की कई पॉलिसी उसकी अपनी कंपनियों को बढ़ावा देती हैं, जबकि विदेशी पेमेंट सर्विस प्रोवाइडर कंपनियों के लिए ये नियम समस्या पैदा करने वाले होते हैं. मार्च में अमेरिकी व्यापार प्रतिनिधि कार्यालय (USTR) ने एक रिपोर्ट में भारत की डिजिटल पेमेंट पॉलिसी को विदेशी व्यापार में बाधा (Trade Barrier) बताया था. रिपोर्ट में कहा गया, अमेरिकी इलेक्ट्रॉनिक पेमेंट सर्विस प्रोवाइडर को UPI इकोसिस्टम में बराबरी का मौका नहीं मिल रहा. यही कारण है कि कई जानकारी बदलाव की शुरुआत को भारत-अमेरिका ट्रेड डील से जोड़कर देख रहे हैं.
UPI आने के बाद Visa और Mastercard को नुकसान?
साल 2016 में UPI को जब शुरू किया गया तो भारत के डिजिटल पेमेंट मार्केट में बड़ा बदलाव आया. पहले ऑनलाइन और ऑफलाइन पेमेंट के लिए डेबिट और क्रेडिट कार्ड का यूज ज्यादा होता था. इन ट्रांजेक्शन पर बैंक, कार्ड नेटवर्क और पेमेंट प्रोसेसर एमडीआर (MDR) के जरिये कमाई करते थे. लेकिन यूपीआई (UPI) के आने के बाद यह मॉडल पूरी तरह बदल गया. इसके शुरू होने से कस्टमर को मुफ्त पेमेंट करने की सुविधा मिली. व्यापारियों को भी इस पर एक्स्ट्रा चार्ज नहीं देना पड़ा और पेमेंट भी तुरंत हो जाता है.
Visa और Mastercard की तीन आपत्ति
- UPI और RuPay पर जीरो MDR
- RuPay को सरकारी पॉलिसी का सपोर्ट
- UPI पर क्रेडिट कार्ड पेमेंट में RuPay को शुरुआती बढ़त
अमेरिका के लिए यूपीआई क्यों अहम
अमेरिका की तरफ से चिंता जताई गई कि अमेरिकी इलेक्ट्रॉनिक पेमेंट सर्विस प्रोवाइडर यूपीआई सिस्टम में बराबरी से हिस्सा नहीं ले पा रहे. नवंबर 2020 में नेशनल पेमेंट्स कॉरपोरेशन ऑफ इंडिया (NPCI) ने तीसरे पक्ष के ऐप प्रोवाइडर्स के लिए यूपीआई ऑनलाइन पेमेंट में 30 प्रतिशत बाजार हिस्सेदारी की लिमिट तय की थी. इसे लागू करने का समय पहले जनवरी 2023 तय था, लेकिन अब इसे दिसंबर 2026 तक टाल दिया गया है. भारत ने ट्रेड एग्रीमेंट के तहत डिजिटल सेक्टर में अमेरिका की कई मांग पहले ही मान ली हैं. पिछले केंद्रीय बजट के दौरान विदेशी कंपनियों को 2047 तक डेटा सेंटर लगाने पर टैक्स छूट का ऐलान किया गया.
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