Explainer: E20 पेट्रोल के बाद क्या CNG में भी मिलावट! क्या है नई गोबरधन स्कीम, कैसे गोबर-पराली से चलेंगी गाड़ियां? क्या है सरकार का महाप्लान

Explainer: E20 पेट्रोल के बाद क्या CNG में भी मिलावट! क्या है नई गोबरधन स्कीम, कैसे गोबर-पराली से चलेंगी गाड़ियां? क्या है सरकार का महाप्लान

भारत में पेट्रोल में एथेनॉल मिलाने की कामयाबी के बाद अब सरकार क्लीन फ्यूल (साफ ईंधन) की तरफ एक और बड़ा कदम उठा रही है. इस बार फोकस है बायो-सीएनजी (Bio-CNG / CBG) पर. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की अध्यक्षता में कैबिनेट ने ‘गोबरधन’ योजना को मंजूरी दे दी है. इसके तहत 2026-27 से 2035-36 तक कुल 23,731 करोड़ रुपये खर्च किए जाएंगे. सीधा मकसद है- खेती के कचरे, गोबर और गीले कचरे से बनने वाली बायो-सीएनजी का प्रोडक्शन 10 गुना तक बढ़ाना.

अगर आपके मन में सवाल आ रहा है कि आखिर बायो-सीएनजी क्या है? यह हमारे घरों और गाड़ियों में आने वाली नॉर्मल CNG से कितनी अलग है? क्या इससे हमारी गाड़ियों का माइलेज कम हो जाएगा? और आम जनता या किसानों को इससे क्या फायदा होगा? तो इस डिटेल्ड एक्सप्लेनर में आपको इन सभी सवालों के जवाब बहुत ही आसान भाषा में मिलेंगे.

Bio-CNG या CBG आखिर क्या बला है?

जब भी कोई जैविक चीज (जैसे- सब्जियां, खाना, गोबर, पराली या सड़ने-गलने वाला कचरा) बंद जगह में सड़ता है, तो उससे प्राकृतिक रूप से एक गैस निकलती है. इसे हम बायोगैस कहते हैं. लेकिन इस शुरुआती बायोगैस में बहुत सी अशुद्धियां (जैसे कार्बन डाइऑक्साइड, नमी और हाइड्रोजन सल्फाइड) होती हैं, जिसकी वजह से इसे सीधे गाड़ियों के इंजन में इस्तेमाल नहीं किया जा सकता.

जब इस बायोगैस को बड़े-बड़े आधुनिक प्लांट में ले जाकर पूरी तरह फिल्टर और प्यूरीफाई (साफ) किया जाता है, तो इसमें से सारी गंदगी बाहर निकल जाती है और मीथेन गैस की मात्रा 90% से ज्यादा हो जाती है. इसके बाद इस शुद्ध गैस को हाई प्रेशर के साथ दबाया (कंप्रेस) जाता है. इसी तैयार गैस को तकनीकी भाषा में CBG या आम भाषा में Bio-CNG कहा जाता है.

इसे बनाने में किन चीजों का इस्तेमाल होता है?

– पराली और फसल अवशेष: गेहूं, धान या गन्ने की कटाई के बाद खेतों में बचा हुआ हिस्सा.
– गोबर और डेयरी वेस्ट: गाय, भैंस और अन्य मवेशियों का गोबर.
– प्रेस मड (Press Mud): चीनी मिलों से निकलने वाला जैविक कचरा.
– नगर निगम का गीला कचरा: हमारे घरों से निकलने वाला किचन वेस्ट, फल-सब्जियों के छिलके और बचा हुआ खाना.
– सीवेज का पानी: नालों और सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट की गाद (Sludge).

क्या Bio-CNG और नॉर्मल CNG एक ही चीज हैं?

ऊपर से देखने पर दोनों गैसें एक जैसी लगती हैं और काम भी बिल्कुल एक जैसा ही करती हैं, लेकिन इनके बनने का जरिया (Source) एक-दूसरे से पूरी तरह अलग है.

1. बनने का तरीका:
– नॉर्मल CNG (Compressed Natural Gas): यह जमीन या समुद्र के नीचे हजारों फीट गहराई में मौजूद फॉसिल फ्यूलके भंडारों से निकाली जाती है. इसे बनने में कुदरत को लाखों साल का वक्त लगा है. एक बार यह खत्म हो गई, तो इसे दोबारा तुरंत नहीं बनाया जा सकता.
– Bio-CNG (Compressed Biogas): यह जमीन के ऊपर मौजूद कचरे, गोबर और पराली से बनाई जाती है. चूंकि कचरा और गोबर हर रोज पैदा होता है, इसलिए यह कभी न खत्म होने वाला ईंधन है.

2. केमिकल स्ट्रक्चर:
– मजेदार बात यह है कि जब बायोगैस को रिफाइन करके Bio-CNG बनाया जाता है, तो इसकी केमिकल प्रॉपर्टीज बिल्कुल वही हो जाती हैं जो जमीन से निकलने वाली नेचुरल CNG की होती है. दोनों में ही मुख्य रूप से मीथेन गैस होती है.
– नतीजा: रिफाइन होने के बाद Bio-CNG और नॉर्मल CNG में 1% का भी फर्क नहीं रहता. इसीलिए इसे बिना किसी टेक्निकल बदलाव के उसी सीएनजी पाइपलाइन और उन्हीं सीएनजी गाड़ियों में इस्तेमाल किया जा सकता है.

सरकार Bio-CNG पर इतना जोर क्यों दे रही है?

भारत दुनिया की सबसे तेजी से बढ़ती अर्थव्यवस्थाओं में से एक है. जैसे-जैसे देश बढ़ रहा है, वैसे-वैसे हमारी ऊर्जा (पेट्रोल, डीजल, गैस) की मांग भी आसमान छू रही है. लेकिन सच्चाई यह है कि भारत को अपनी प्राकृतिक गैस की जरूरत का एक बहुत बड़ा हिस्सा विदेशों से इंपोर्ट (आयात) करना पड़ता है, जिसके लिए हर साल अरबों डॉलर खर्च होते हैं.

दूसरी तरफ, भारत की एक और बड़ी कड़वी सच्चाई यह है कि हमारे देश में हर साल करोड़ों टन कृषि कचरा (पराली) जला दिया जाता है, जिससे सर्दियों में पूरा उत्तर भारत धुएं के आगोश में समा जाता है और हवा जहरीली हो जाती है.

‘गोबरधन’ योजना इन दोनों बहुत बड़ी समस्याओं पर एक साथ प्रहार करती है:

– विदेशी निर्भरता में कमी: कचरे से गैस बनाकर हम विदेशों से खरीदी जाने वाली महंगी एलएनजी (LNG) और सीएनजी पर अपनी निर्भरता घटा सकते हैं.
– प्रदूषण से मुक्ति: जब किसान पराली बेचने लगेंगे, तो खेतों में आग लगाने की घटनाएं कम होंगी और हवा साफ होगी.
– सर्कुलर इकोनॉमी कचरे को फेंकने या जलाने के बजाय उससे पैसा और ऊर्जा बनाना ही सर्कुलर इकोनॉमी है.
– ग्रामीण भारत का विकास: इन प्लांटों के लगने से गांवों में नए उद्योग लगेंगे, युवाओं को रोजगार मिलेगा और ग्रामीण अर्थव्यवस्था मजबूत होगी.

गोबरधन योजना के 6 मुख्य इंजन (मास्टरप्लान)

23,731 करोड़ रुपये के बजट वाली इस योजना को धरातल पर उतारने के लिए सरकार ने 6 मुख्य पिलर्स यानी इंजनों पर काम करने का फैसला किया है:

Engine 1: खरीद की गारंटी (Assured Offtake)

पहले बायो-सीएनजी प्लांट लगाने वाले बिजनेसमैन की सबसे बड़ी चिंता यह होती थी कि ‘हम गैस बना तो लेंगे, लेकिन इसे खरीदेगा कौन?’
सरकार ने इसका पक्का इलाज कर दिया है. सरकार ने सिटी गैस डिस्ट्रीब्यूशन (CGD) कंपनियों (जैसे इंड्रप्रस्थ गैस, अडाणी गैस आदि) के लिए बायो-सीएनजी खरीदना कानूनी रूप से अनिवार्य कर दिया है.

वित्त वर्ष 2026-27: कुल गैस में 3% बायो-सीएनजी मिलाना जरूरी होगा.
वित्त वर्ष 2027-28: यह सीमा बढ़ाकर 4% की जाएगी.
वित्त वर्ष 2028-29 से: हर गैस कंपनी को कम से कम 5% बायो-सीएनजी मिलाना ही पड़ेगा.

Engine 2: फिक्स्ड और स्टेबल प्राइसिंग (स्थिर दाम)

अंतरराष्ट्रीय बाजार में गैस के दाम घटते-बढ़ते रहते हैं, जिससे निवेशकों को नुकसान का डर रहता है. सरकार ने इस डर को खत्म करने के लिए 2,110 रुपये प्रति MMBTU की एक स्टेबल रेट तय कर दी है. यह प्राइस फ्रेमवर्क अगले 10 सालों तक लागू रहेगा, जिससे नया बिजनेस शुरू करने वालों को बैंक से लोन लेने और मुनाफा कमाने का साफ रास्ता दिखेगा.

Engine 3: कैपिटल असिस्टेंस (प्लांट लगाने के लिए सीधी मदद)

नया Bio-CNG प्लांट लगाने में भारी-भरकम पूंजी लगती है. इसीलिए सरकार नए प्लांट लगाने वाली कंपनियों को प्रति टन दैनिक क्षमता पर 2 करोड़ रुपये तक की सब्सिडी/सरकारी सहायता देगी. यह मदद न केवल गैस बनाने वाली मशीनों पर मिलेगी, बल्कि गांवों से पराली और गोबर इकट्ठा करने वाली मशीनों पर भी लागू होगी.

Engine 4: पाइपलाइन नेटवर्क का विस्तार

अक्सर बायो-सीएनजी प्लांट गांवों के पास बनते हैं, जबकि गैस की खपत शहरों में होती है. प्लांट से गैस को मुख्य ग्रिड तक पहुंचाने के लिए सरकार पाइपलाइन का मजबूत इंफ्रास्ट्रक्चर तैयार करेगी ताकि ट्रांसपोर्टेशन का खर्च कम से कम हो और गैस सस्ती बनी रहे.

Engine 5: क्रेडिट सपोर्ट और लोन की सुविधा (MSMEs के लिए)

गांवों के छोटे उद्यमियों, युवाओं और महिला समूहों को बायो-सीएनजी के बिजनेस में लाने के लिए एक विशेष ‘क्रेडिट गारंटी मैकेनिज्म’ बनाया जाएगा. इससे बैंकों को बिना किसी डर के छोटे बिजनेसमैन को लोन देने में आसानी होगी.

Engine 6: CBG चैलेंज फंड (जिला स्तर पर प्लानिंग)

हर जिले में एक जैसा कचरा नहीं होता. किसी जिले में पराली ज्यादा है, तो कहीं गोबर ज्यादा है. इसके लिए जिला स्तर पर एक ‘CBG चैलेंज फंड’ बनेगा, जो हर जिले के हिसाब से कचरे की मैपिंग करेगा और वहां लोकल लेवल पर टेक्नोलॉजी को प्रमोट करेगा.

किसानों और ग्रामीण भारत की तो बल्ले-बल्ले!

गोबरधन योजना केवल शहरों की गाड़ियों के लिए नहीं है, इसका सबसे बड़ा और सीधा फायदा देश के किसानों और ग्रामीण इलाकों को होने जा रहा है.

1. कचरे से एक्स्ट्रा कमाई: अब तक किसान गन्ने की पत्तियां, धान की पराली या मवेशियों का गोबर या तो फेंक देते थे या जला देते थे. अब Bio-CNG प्लांट चलाने वाली कंपनियां किसानों से सीधे यह बायोमास खरीदेंगी. इससे किसानों को बिना किसी अतिरिक्त मेहनत के हर फसल के बाद एक एक्स्ट्रा इनकम होगी.

2. हाई क्वालिटी वाली जैविक खाद (Organic Fertilizer): बायो-सीएनजी बनाने की प्रक्रिया के बाद जो ठोस और तरल अवशेष (बचा हुआ हिस्सा) बचता है, वह कोई कचरा नहीं होता. उसे FOM (Fermented Organic Manure) यानी किण्वित जैविक खाद कहा जाता है. यह खाद केमिकल वाली यूरिया और डीएपी (DAP) से कहीं ज्यादा ताकतवर और सुरक्षित होती है. जब किसान इस खाद का खेतों में इस्तेमाल करेंगे, तो उनकी मिट्टी की उपजाऊ क्षमता (Fertility) बढ़ेगी और फसलों की लागत कम होगी.

3. गांवों में रोजगार: एक बायो-सीएनजी प्लांट को चलाने के लिए कचरा इकट्ठा करने से लेकर, ट्रकों के ट्रांसपोर्टेशन, प्लांट के ऑपरेशन और खाद की बिक्री तक सैकड़ों लोगों की जरूरत होती है. इससे ग्रामीण युवाओं को अपने ही गांव के पास सम्मानजनक रोजगार मिलेगा.

CNG कार चलाने वालों पर इसका क्या असर पड़ेगा? आपके हर सवाल का जवाब

क्या गाड़ी में कोई बदलाव (Modification) कराना पड़ेगा?

बिल्कुल नहीं! जैसा कि ऊपर बताया गया, रिफाइन होने के बाद Bio-CNG और नेचुरल CNG का रासायनिक ढांचा बिल्कुल एक जैसा (100% Identical) होता है. आपको अपनी कार के सीएनजी किट, सिलिंडर या इंजन में 1% का भी बदलाव कराने की जरूरत नहीं है.

क्या माइलेज या पिकअप कम हो जाएगा?

बिल्कुल नहीं! Bio-CNG का ‘कैलोरीफिक वैल्यू’ (जलने की क्षमता) नॉर्मल CNG के बराबर ही होती है. आपकी कार का माइलेज, पिकअप और इंजन की लाइफ बिल्कुल वैसी ही रहेगी जैसी पहले थी.

यह आप तक कैसे पहुंचेगी?

जब आप पेट्रोल पंप पर सीएनजी भरवाने जाएंगे, तो आपको अलग से यह चुनने की जरूरत नहीं होगी कि आपको नॉर्मल CNG चाहिए या Bio-CNG. पाइपलाइन नेटवर्क में ही दोनों गैसें आपस में मिक्स होकर आएंगी. आपको पता भी नहीं चलेगा और आपकी गाड़ी पर्यावरण को बिना नुकसान पहुंचाए आसानी से चलती रहेगी.

भारत में Bio-CNG का वर्तमान और भविष्य

भारत में बायो-सीएनजी का यह सफर आज अचानक शुरू नहीं हो रहा है. इससे पहले सरकार की SATAT पहल और बायोमास एग्रीगेशन योजनाओं के तहत देश भर में 200 से अधिक Bio-CNG प्लांट सफलतापूर्वक चालू किए जा चुके हैं.

इंदौर (मध्य प्रदेश) का एशिया का सबसे बड़ा ‘गोबर-धन’ बायो-सीएनजी प्लांट इसका एक जीवंत उदाहरण है, जहां शहर के गीले कचरे से बायो-सीएनजी बनाई जा रही है और उससे शहर की सैकड़ों सिटी बसें चलाई जा रही हैं. अब ‘गोबरधन’ योजना के तहत 23,731 करोड़ रुपये का निवेश करके इस मॉडल को पूरे देश में राष्ट्रीय स्तर पर फैलाने की तैयारी है.

Bureau Report

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