भारत में कार खरीदने का एक पुराना नियम रहा है. जब भी कोई नई गाड़ी खरीदता था, तो सबसे पहला सवाल यही होता था- “कितना देती है?”. लेकिन अब जमाना बदल चुका है. आज का भारतीय कार खरीदार सिर्फ शोरूम प्राइस या महीने की EMI देखकर गाड़ी नहीं बुक कर रहा है. वह हाथ में कैलकुलेटर लेकर यह हिसाब लगा रहा है कि अगले 5 से 10 सालों में यह कार उसकी जेब पर कितनी भारी पड़ेगी. आइए समझते हैं कार मार्केट का यह नया गणित.
‘कितना देती है’ का दौर अब हुआ पुराना
दशकों तक भारत में कार की बिक्री सिर्फ एक ही बात पर टिकी थी, और वह थी कार का माइलेज. अगर गाड़ी 1 लीटर में ज्यादा किलोमीटर चलती थी, तो वह सुपरहिट मान ली जाती थी. लेकिन अब केवल पेट्रोल या डीजल का माइलेज देखकर फैसला लेना समझदारी नहीं माना जा रहा है.
टोटल कॉस्ट ऑफ ओनरशिप का नया गणित
आज का ग्राहक ‘टोटल कॉस्ट ऑफ ओनरशिप’ यानी गाड़ी को लंबे समय तक रखने के पूरे खर्चे को देख रहा है. इसमें गाड़ी की खरीद कीमत, मेंटेनेंस, इंश्योरेंस, फ्यूल या बिजली का खर्च और बाद में मिलने वाली रीसेल वैल्यू सब कुछ शामिल है. ग्राहक अब समझ चुके हैं कि सस्ती गाड़ी भी बाद में महंगी साबित हो सकती है.
ऑप्शन्स की भरमार ने बदला ग्राहकों का मूड
बाजार में अब सिर्फ पेट्रोल और डीजल गाड़ियां नहीं हैं. CNG, हाइब्रिड और इलेक्ट्रिक (EV) गाड़ियों के आने से ग्राहकों के पास बहुत सारे विकल्प मौजूद हैं. CNG में शुरुआत में कुछ पैसा ज्यादा लगता है लेकिन चलाने का खर्च कम होता है. हाइब्रिड गाड़ियां महंगी होती हैं पर माइलेज जबरदस्त देती हैं. वहीं EV का हिसाब-किताब बिल्कुल अलग है.
शहरों और गांवों की सोच में फर्क
शहरों के ग्राहक अब गाड़ी के मेंटेनेंस, बैटरी लाइफ और रीसेल वैल्यू पर ज्यादा ध्यान दे रहे हैं. वहीं ग्रामीण इलाकों में अभी भी गाड़ी की शुरुआती कीमत और रोज का फ्यूल खर्च ज्यादा मायने रखता है. कार कंपनियां भी अब समझ गई हैं कि हर ग्राहक की जरूरत अलग है और सिर्फ एक फॉर्मूला सब पर लागू नहीं हो सकता.
फीचर्स और टेक भी बने फैसले की वजह
कीमत के अलावा अब कार में मिलने वाली टेक्नोलॉजी, सेफ्टी फीचर्स और ड्राइविंग एक्सपीरियंस भी बड़े पैमाने पर बजट का हिस्सा बन गए हैं. ग्राहक थोड़ा ज्यादा पैसा खर्च करने को तैयार हैं, बशर्ते उन्हें गाड़ी में आधुनिक फीचर्स और प्रीमियम अनुभव मिले.
Bureau Report
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