गुरुग्राम के एक प्रसिद्ध प्राइवेट अस्पताल में कुछ समय पहले सात साल की एक बच्ची डेंगू के इलाज के लिए 15 दिन तक आईसीयू में एडमिट रही लेकिन उसको जब राहत नहीं मिली तो फैमिली ने दूसरे अस्पताल में शिफ्ट करने का प्लान किया. शिफ्ट करने से पहले अस्पताल का 16 लाख का बिल देखकर फैमिली के होश उड़ गए. बिल अदा करने के बाद ही उनको जाने की परमीशन मिली लेकिन दूसरी जगह शिफ्ट करने के दौरान बच्ची की मौत हो गई. परिवार ने अपनी व्यथा सोशल मीडिया के जरिए शेयर की. इस मार्मिक स्टोरी ने लोगों का ध्यान खींचा. केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्री को दखल देना पड़ा और मामले की पूरी जांच की गई.
बिलों का बोझ
इस तरह की कई स्टोरीज हम अपने आस-पास के माहौल में आए दिन देखते-सुनते हैं जहां प्राइवेट अस्पतालों के मेडिकल बिल लोगों की कमर तोड़ देती है. ऑनलाइन प्लेटफॉर्म लोकल सर्कल्स(Local Circles) ने एक देशव्यापी सर्वे में पाया कि 23,084 उत्तरदाताओं में से 56% ने आईसीयू या कमरों जैसी सुविधाओं के लिए अत्यधिक हाई रेट की शिकायत की, जबकि 51% ने दवाओं और उपभोग सामग्रियों की उच्च कीमतों को लेकर बात कही. लगभग 49% लोगों ने कहा कि उनके बिलों में अनावश्यक डॉक्टर कंसल्टेशन चार्ज शामिल किए गए थे, जबकि 43% लोगों ने विशेष रूप से अत्यधिक उच्च डॉक्टर परामर्श शुल्क का उल्लेख किया. सर्वे में शामिल 40% लोगों ने दवाओं या उपभोग्य सामग्रियों की मात्रा के लिए अधिक बिलिंग की सूचना दी, जबकि अन्य 40% ने कहा कि उन्हें अप्रत्याशित या अज्ञात शुल्कों का सामना करना पड़ा.
क्या है संसदीय समिति की रिपोर्ट
इस परिप्रेक्ष्य में संसद की स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण संबंधी समिति ने अपनी रिपोर्ट (Affordability and accessibility of healthcare facilities in public and private sector) में निजी अस्पतालों के मेडिकल बिल एवं वहां के कमरे के किराए को लेकर चिंता जताई है. संसद की समिति ने माना है कि कई निजी अस्पतालों में कमरे का किराया उस क्षेत्र के 3-स्टार होटल के औसत किराए से भी अधिक होता है. सिर्फ इतना ही नहीं महंगे कमरे के साथ डॉक्टर की विजिट फीस, नर्सिंग चार्जेस और अन्य सर्विस शुल्क भी अनुपातिक रूप से बढ़ जाते हैं, जिससे कुल मेडिकल बिल अप्रत्याशित रूप से बढ़ जाता है. इसके मद्देनजर समिति ने सरकार को निजी अस्पतालों के कमरे के किराए को 3 स्टार होटल के औसत रेट से अधिक नहीं रखने की सिफारिश की है. यहीं से सवाल उठता है कि महंगा कमरा मरीज के कुल इलाज के खर्च को कितना बढ़ाता है और इन सिफारिशों से आम आदमी को कितनी राहत मिल सकती है?
सरकारी Vs प्राइवेट अस्पतालों के बिलों में अंतर
समिति ने 80वें NSS सर्वे (2025) के आंकड़ों के आधार पर कहा है कि सरकारी अस्पताल में प्रति भर्ती औसतन Out-of-Pocket (OOP) खर्च ₹6,631 है, जबकि निजी अस्पतालों में यह ₹50,508 (लगभग 8 गुना) है.
सरकारी अस्पताल में प्रसव का औसतन OOP खर्च ₹2,299 है, जबकि निजी अस्पताल में यह ₹37,630 (लगभग 10 से 15 गुना अधिक) पहुंच जाता है.
आउटपेशेंट (OPD) खर्च (प्रति स्पेल)
सरकारी अस्पताल: ₹289
निजी अस्पताल: 1,447
संभावित बचत:
यदि अस्पतालों के कमरे का किराया 3-स्टार होटल के औसत रेट से कैप कर दिया जाए और कमरे के आधार पर डॉक्टर/नर्सिंग फीस में होने वाली हिडन बढ़ोतरी को बंद कर दिया जाए तो मरीज के कुल अस्पताल बिल में 30% से 50% तक की प्रत्यक्ष कमी आ सकती है. इससे मध्यम वर्ग और उन मरीजों को भारी राहत मिलेगी जो स्वास्थ्य बीमा से बाहर हैं या सीमित बीमा कवर रखते हैं.
प्राइवेट अस्पताल Vs 3-स्टार कमरे का किराया
अस्पताल के कमरे का किराया: बड़े शहरों (मेट्रो और टियर-1) के कॉरपोरेट/निजी अस्पतालों में प्राइवेट/सुपीरियर कमरों का किराया ₹8,000 से ₹25,000+ प्रति दिन तक होता है.
3-स्टार होटल का किराया: उन्हीं इलाकों में 3-स्टार होटल का औसतन किराया ₹2,500 से ₹5,000 प्रति दिन होता है.
तुलना: अस्पताल के कमरे का किराया 3-स्टार होटल के औसत किराए से 2 से 5 गुना अधिक वसूला जा रहा है.
अनुपातिक बढ़ोतरी: निजी अस्पतालों का बिलिंग मॉडल इस प्रकार बनाया जाता है कि मरीज जिस श्रेणी का कमरा (General, Semi-Private, Private, Deluxe) चुनता है, उसके आधार पर डॉक्टर विजिट/कंसल्टेशन फीस, नर्सिंग चार्जेस, ऑपरेशन थिएटर (OT) और सर्जिकल शुल्क, इक्विपमेंट व प्रोसीजर चार्ज सब स्वतः बढ़ जाते हैं.
असर: केवल कमरे की श्रेणी बदलने से समान इलाज, समान दवा और समान डॉक्टर का कुल बिल 50% से 100% तक बढ़ जाता है.
रेगुलेशन की सिचुएशन
देश में ‘क्लिनिकल एस्टैब्लिशमेंट्स (रजिस्ट्रेशन एंड रेगुलेशन) एक्ट, 2010’ मौजूद है. लेकिन राज्यों में इसका क्रियान्वयन असमान है. निजी अस्पतालों के कमरे के किराए पर कोई केंद्रीय कैपिंग नहीं है, जिसे समिति ने लागू करने की सिफारिश की है.
1. यह कानून सभी राज्यों में समान रूप से लागू नहीं है.
2. वर्तमान में किसी भी केंद्रीय या राज्य नियामक संस्था ने निजी अस्पतालों के कमरे के किराए, डॉक्टर फीस या प्रोसीजर चार्ज पर कोई अधिकतम सीमा (Price Cap) तय नहीं कर रखी है.
3. अस्पताल अपने हिसाब से टैरिफ कार्ड तय करने के लिए स्वतंत्र हैं.
समिति के सुझाव
1. सपा सांसद राम गोपाल यादव की अध्यक्षता वाली समिति ने सुझाव दिया कि प्राइवेट और सरकारी हेल्थकेयर संस्थानों में स्टैंडर्ड मेडिकल और सर्जिकल प्रॉसीजर के लिए फिक्स्ड और एकीकृत पैकेज रेट होने चाहिए. इन पैकेजों में सर्जन फीस, डायग्नोस्टिक टेस्ट, उपभोग्य एंड स्टैंडर्ड पोस्ट ऑपरेटिव केयर भी शामिल होने चाहिए.
2. इसने जटिल उपचारों के लिए अग्रिम लागत अनुमान, उपचार लागत और इंश्योरेंस पर मरीजों को गाइड करने के लिए वित्तीय सलाहकारों को नियुक्त करने की बात कही.
3. Continuum of Care पैकेज के तहत एक सिंगल कैप्ड पेमेंट के माध्यम से स्क्रीनिंग, टेस्ट, ट्रीटमेंट से लेकर बाद की देखभाल को भी कवर करने की सिफारिश की गई.
4. इसने केंद्र से सार्वजनिक स्वास्थ्य व्यय को जीडीपी के 2.5% तक बढ़ाने, सरकारी अस्पतालों को मजबूत करने और विस्तार करने का आग्रह किया.
AHPI ने क्या कहा?
समिति की रिपोर्ट पर देश के निजी अस्पतालों के सबसे बड़े नेटवर्क एसोसिएशन ऑफ प्राइवेट हेल्थकेयर प्रोवाइडर्स ऑफ इंडिया (एएचपीआई) ने कहा कि कमरे के शुल्कों पर एक समान सीमा तय करना उल्टा पड़ सकता है क्योंकि यह बुनियादी ढांचे की गुणवत्ता, कर्मचारियों की संख्या, निगरानी उपकरणों के स्तर और क्लीनिकल कांप्लैक्सिटी को दर्शाता है, जिसे पॉलिसी लेवल पर डिसाइड करना मुश्किल है. एएचपीआई के महानिदेशक गिरिधर ज्ञानी ने अपने स्टेटमेंट में कहा कि कई कॉर्पोरेट अस्पतालों में बड़ी संख्या में मेडिकल टूरिस्ट भी आते हैं जो विश्व स्तरीय चिकित्सा सेवाओं और बेहतरीन सुविधाओं के लिए विशेष रूप से भारत आते हैं. अगर हमारे पास बेसिक कैटेगरी के केवल एक ही तरह के कमरे होंगे तो वे भारत क्यों आएंगे?” उन्होंने कहा कि एएचपीआई ने एक ऐसे नियम का समर्थन किया है जिसके तहत सभी अस्पतालों को अपनी सुविधाएं प्रदर्शित करना अनिवार्य होता है इससे मरीजों को अपनी जरूरत और सामर्थ्य के अनुसार चीजें चुनने का विकल्प मिलता है.
Bureau Report
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