पश्चिम बंगाल की राजनीति में रविवार को उस वक्त एक बहुत बड़ा सियासी भूचाल आ गया, जब मुख्यमंत्री ममता बनर्जी के खिलाफ बगावत करने वाले तृणमूल कांग्रेस के 20 लोकसभा सांसदों ने एक बेहद चौंकाने वाला कदम उठाया. इन बागी सांसदों ने त्रिपुरा की एक गुमनाम और कम जानी-मानी पार्टी ‘नेशनलिस्ट सिटिजन्स पार्टी ऑफ इंडिया’ में विलय करने का फैसला किया है.
इस सियासी ड्रामे की स्क्रिप्ट दिल्ली में लिखी गई. 20 में से 19 बागी सांसदों ने पहले केंद्रीय मंत्री भूपेंद्र यादव के आवास पर एक हाई-लेवल मीटिंग की. इसके ठीक बाद, ये सभी सांसद लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला के घर पहुंचे और उन्हें एक पत्र सौंपा. पत्र में साफ कहा गया है कि वे NCPI में विलय कर रहे हैं और आने वाले समय में केंद्र की सत्ताधारी NDA गठबंधन का समर्थन करेंगे. साथ ही, उन्होंने संसद में विपक्षी ‘INDIA’ ब्लॉक से अलग बैठने की व्यवस्था करने की भी मांग की.
मानसून सत्र से ठीक पहले NDA की लगी लॉटरी
ये घटना सिर्फ बंगाल तक सीमित नहीं है, बल्कि देश की राष्ट्रीय राजनीति को बदलने वाला है. संसद का मानसून सत्र 21 जुलाई से शुरू होने जा रहा है, जहां मोदी सरकार कई अहम संवैधानिक संशोधन बिल पेश करने की तैयारी में है, जिनके लिए दो-तिहाई बहुमत की जरूरत होती है. इससे पहले सरकार ने महिलाओं के लिए 33% आरक्षण से जुड़ा 131वां संवैधानिक संशोधन बिल पेश किया था, जो परिसीमन के पेंच के कारण गिर गया था. तब पक्ष में 298 और विरोध में 238 वोट पड़े थे. अब TMC के इन 20 सांसदों के पाला बदलने और NDA को समर्थन देने से सरकार का पलड़ा संसद में भारी हो जाएगा और अहम बिलों को पास कराना आसान हो जाएगा.
क्या पर्दे के पीछे है BJP का हाथ?
इस पूरी बगावत के पीछे भारतीय जनता पार्टी (BJP) का हाथ होने की अटकलें तेज हैं. बैठक में बीजेपी के संकटमोचक कहे जाने वाले निशिकांत दुबे और बंगाल बीजेपी के कद्दावर नेता सुवेंदु अधिकारी की मौजूदगी ने इन चर्चाओं को हवा दी. मामले में सबसे बड़ा ट्विस्ट तब आया जब ममता बनर्जी के सबसे भरोसेमंद सहयोगियों में से एक सुदीप बंद्योपाध्याय ने भी बागी लिस्ट पर दस्तखत कर दिए और केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह से मुलाकात की. हालांकि, सुवेंदु अधिकारी और अन्य बीजेपी नेताओं ने आधिकारिक तौर पर इस फूट में अपनी किसी भी भूमिका से साफ इनकार किया है और इसे टीएमसी का अंदरूनी झगड़ा बताया है.
इस विलय के रास्ते में कई कांटे भी हैं. बंगाल बीजेपी के जमीनी कार्यकर्ता इस बात से नाराज हैं कि जिन टीएमसी नेताओं के खिलाफ वे सालों से खून-पसीना बहाकर लड़ रहे थे, अब उन्हीं के साथ मंच साझा करना पड़ेगा. इसके अलावा, सुदीप बंद्योपाध्याय के बागी गुट में आने से पुराने दलबदलू नेताओं जैसे तापस रॉय (जो अभी सुवेंदु की कैबिनेट में मंत्री हैं) और सजल घोष में भारी नाराजगी है. तापस रॉय ने तो खुलेआम सुदीप बंद्योपाध्याय को ‘मौकापरस्त’ तक कह डाला है.
क्या रद्द होगी सांसदी?
इस विलय को कानूनी रूप से अमान्य ठहराने के लिए टीएमसी के राष्ट्रीय महासचिव अभिषेक बनर्जी ने मोर्चा खोल दिया है. उन्होंने स्पीकर ओम बिरला को पत्र लिखकर सुप्रीम कोर्ट के प्रसिद्ध ‘सुभाष देसाई बनाम महाराष्ट्र के राज्यपाल’ केस का हवाला दिया है. मूल राजनीतिक दल का वर्चस्व विधायी विंग (सांसदों) से ऊपर होता है. कोई विलय तभी वैध है जब पूरी टीएमसी पार्टी किसी दूसरी पार्टी में मिले, सांसदों का एक गुट खुद से फैसला नहीं ले सकता. देश के दिग्गज वकील कपिल सिब्बल ने भी कहा कि मूल संगठन की अनुमति के बिना किसी दूसरी पार्टी में जाना दलबदल कानून के तहत अयोग्यता का सबसे मजबूत आधार है.
अंजान ‘NCPI’ आई चर्चा में
इस पूरे खेल ने ‘इंक पेन’ चुनाव चिह्न वाली त्रिपुरा की छोटी सी पार्टी NCPI को रातों-रात नेशनल हेडलाइंस में ला दिया है. दिलचस्प बात यह है कि इस पार्टी के संस्थापक सदस्य और RSS कार्यकर्ता सुजीत डे इस विलय से बेहद गुस्से में हैं. उन्होंने बताया कि हमने त्रिपुरा चुनाव में जमीन पर टीएमसी और दलबदलू नेताओं के खिलाफ लड़ाई लड़ी थी, आज वही हमारी पार्टी में आ रहे हैं. अब गेंद पूरी तरह से लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला के पाले में है. उन्हें तय करना है कि क्या इन 20 सांसदों के विलय को मंजूरी दी जाए या नहीं. बहरहाल, स्पीकर का फैसला जो भी हो, यह मामला देश की सर्वोच्च अदालत के दरवाजे तक पहुंचना तय माना जा रहा है.
Bureau Report
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