कौन हैं भगवान जगन्नाथ के प्रथम सेवक? रथ यात्रा से पहले सोने की झाड़ू से करते हैं रास्‍ते की सफाई

कौन हैं भगवान जगन्नाथ के प्रथम सेवक? रथ यात्रा से पहले सोने की झाड़ू से करते हैं रास्‍ते की सफाई

ओडिशा के पुरी में आषाढ़ का महीना बहुत खास होता है. इस पूरे महीने रथ यात्रा से जुड़ी प्रमुख रस्‍में निभाई जाती हैं और भगवान जगन्‍नाथ की रथ यात्रा निकाली जाती है. हिंदुओं का यह बड़ा पर्व स्‍नान पूर्णिमा (ज्‍येष्‍ठ पूर्णिमा) से प्रारंभ होता है और महीने भर चलता है. इस साल 29 जून को स्‍नान पूर्णिमा मनाई गई और आज 16 जुलाई 2026 को भगवान जगन्‍नाथ की रथ यात्रा निकल रही है जो कि 27 जुलाई को भगवान के अपने मूलधाम वापस लौटने पर समाप्‍त होगी. 

रथ यात्रा से पहले रथ यात्रा का मार्ग साफ करने की एक अनूठी रस्‍म निभाई जाती है, जिसे छेरा पहरा कहते हैं. इसमें भगवान जगन्‍नाथ के प्रथमसेवक सोने की झाड़ू से रथ यात्रा के लिए प्रतीकात्‍मक तौर पर मार्ग साफ करते हैं. 

पुरी के राजा हैं प्रथम सेवक

पुरी के राजा को भगवान जगन्‍नाथ का प्रथम सेवक माना गया है. वर्तमान में पुरी के ‘राजा’ गजपति महाराजा दिव्यसिंह देव यादव हैं. इस लिहाज से वह भगवान जगन्नाथ के प्रथम सेवक हैं और लोग उन्हें भगवान श्री जगन्नाथ जी का ही आदेश प्रतिरूप भी मानते हैं. 

गजपति महाराजा दिव्यसिंह देव यादव जी रथ यात्रा से पूर्व सोने की झाडू लगा कर भगवान जगन्नाथ जी की सेवा करते हैं. यह संदेश है कि भगवान के सामने राजा-प्रजा सब बराबर हैं. कोई छोटा-बड़ा नहीं है. 

17 साल की उम्र में संभाला था सिंहासन 

गजपति महाराजा दिव्यसिंह देव यादव परंपरागत रूप से श्री जगन्‍नाथ मंदिर समिति के अध्यक्ष की भूमिका भी निभा रहे हैं. वे भोई राजवंश के वर्तमान मुखिया हैं और उन्हें गजपति महाराजा दिव्यसिंह देव चतुर्थ के नाम से भी जाना जाता है. दिव्यसिंह देब, गजपति महाराजा बीरकिशोर देव के पुत्र हैं. 1970 में जब उनके पिता की मृत्यु हुई तो वे 17 साल की उम्र में सिंहासन पर बैठे थे.

भोई राजवंश का इतिहास 

भोई राजवंश, प्राचीन त्रिकलिंग क्षेत्र (कलिंग, उत्कल, दक्षिण कोशल) के वंशानुगत शासकों से निकला हुआ है. लेकिन गजपति उपाधि का इतिहास पूर्वी गंग वंश से संबंधित है और 12वीं शताब्दी से जगन्नाथ मंदिर से जुड़ा हुआ है. यह राजवंश “उत्कल” क्षेत्र (वर्तमान ओडिशा) में शासन करता था. गजपति, ओडिशा में पुरी के राजा द्वारा धारण की गई एक उपाधि है.

27 जुलाई को संपन्‍न होगी यात्रा 

आज भगवान जगन्‍नाथ 3 किलोमीटर दूर स्थित गुंडिचा मंदिर जाएंगे और वहां अपनी मौसी गुंडिचा का आतिथ्‍य स्‍वीकार करेंगे. प्रभु गुंडिचा मंदिर में 8 दिन ठहरेंगे. इसके बाद ‘बहुदा यात्रा’ निकलेगी. जिसमें भगवान जगन्‍नाथ अपने मंदिर वापस लौटेंगे. वहीं 27 जुलाई को अपने स्‍थान पर पुन: विराजमान होंगे, इसे नीलाद्रि बिजै कहते हैं. 

बता दें कि सोने की मूठ वाली झाड़ू से मार्ग बुहारने की यह प्रक्रिया यह भी संदेश देती है कि लक्ष्‍मी स्‍वरूपा यह सोने की झाड़ू नकारात्‍मकता को भी दूर करती है. 

Bureau Report

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