भारतीय सेना में नेपाली गोरखा सैनिकों की भर्ती पर पिछले चार साल से लगे ब्रेक के खिलाफ अब नेपाल के भीतर ही विरोध की चिंगारी भड़क गई है. इस हफ्ते पोखरा शहर में सैकड़ों युवाओं और पूर्व सैनिकों ने ‘अग्निपथ योजना’ के तहत भर्ती प्रक्रिया तुरंत शुरू करने की मांग की है. नेपाली युवाओं का कहना है कि खाड़ी देशों में जाकर पसीना बहाने से लाख गुना बेहतर है कि हम भारतीय सेना में ‘अग्निवीर’ बनकर गर्व से देश की सेवा करें.
भारत और नेपाल के बीच गोरखा सैनिकों की भर्ती दोनों देशों के बीच के पुराने और मजबूत संबंधों में से एक रही है. साल 2019 से ही ये भर्तियां रुकी हुई हैं. साल 2022 में भारत सरकार ने ‘अग्निपथ योजना’ शुरू की थी, जिसके बाद नेपाल सरकार ने इन भर्तियों पर रोक लगा दी थी, लेकिन अब 3 साल बाद युवाओं का गुस्सा फूट पड़ा है.
2020 से क्यों थमी है भर्ती?
गोरखा भर्ती के रुकने की वजह नेपाल सरकार की आपत्ति है. साल 2022 में शुरू हुई अग्निपथ योजना के तहत केवल 25% सैनिकों को स्थायी कमीशन मिलता है, जबकि 75% को चार साल बाद ‘सेवा निधि’ पैकेज देकर कार्यमुक्त कर दिया जाता है. नेपाल सरकार का कहना है कि 4 साल बाद लौटने वाले युवाओं के भविष्य और पेंशन/लॉन्ग टर्म बेनिफिट्स पर स्थिति साफ नहीं है. काठमांडू का तर्क है कि नई भर्ती व्यवस्था 1947 में भारत, नेपाल और ब्रिटेन के बीच हुए ऐतिहासिक समझौते के मूल प्रावधानों के अनुरूप नहीं है, इसलिए इस पर नए सिरे से राजनीतिक सहमति जरूरी है.
‘खाड़ी देशों में मजदूरी से बेहतर है भारतीय सेना की वर्दी’
दरअसल, नेपाल में रोजगार के अवसरों की भारी कमी है. इसलिए अब युवा सड़कों पर हैं. प्रदर्शन कर रहे युवाओं का कहना है कि खाड़ी (गल्फ) देशों में कठिन परिस्थितियों में मजदूरी करने की तुलना में भारतीय सेना में 4 साल का ‘अग्निवीर’ कार्यकाल भी कहीं अधिक सम्मानजनक और आर्थिक रूप से बढ़िया है.
प्रदर्शनकारियों ने यह मांग भी उठाई कि पूर्व सैनिकों के संगठनों के रजिस्ट्रेशन पर लगाई गई प्रशासनिक पाबंदियों को तुरंत हटाया जाए, ताकि वे अपने कल्याण और अधिकारों की लड़ाई प्रभावी ढंग से लड़ सकें.
‘खतरे में गोरखा सैनिकों की पहचान और परंपरा’
इस पूरे मामले में गोरखा ब्रिगेड के अध्यक्ष कर्नल (सेवानिवृत्त) कृष्ण बहादुर खत्री ने बड़ी बात कही. उनके अनुसार, ‘सुगौली संधि के बाद से 207 वर्षों से अधिक समय तक नेपाली युवाओं की भारतीय सेना में भर्ती बिना बाधा चलती रही, भर्ती बंद होने से न केवल युवाओं से रोजगार छिन रहा है, बल्कि पीढ़ियों से चली आ रही गोरखा सैनिकों की पहचान और परंपरा भी खतरे में पड़ गई है.’
भारत का क्या रुख है?
भारत ने इस मुद्दे पर अपना रुख स्पष्ट रखा है. पूर्व चीफ ऑफ डिफेंस स्टाफ (CDS) जनरल अनिल चौहान ने भी स्पष्ट किया था कि भारतीय सेना की सभी भर्तियां अब अग्निपथ मॉडल के तहत ही होंगी. ऐसे में यह तय करने की जिम्मेदारी पूरी तरह काठमांडू (नेपाल सरकार) की है कि वह अपने नागरिकों को इस योजना के तहत भारतीय सेना में भेजना चाहता है या नहीं.
Bureau Report
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