दिल्ली पुलिस ने जंतर-मंतर पर हुए छात्र प्रदर्शन के दौरान पुलिस की कार्रवाई को लेकर सुप्रीम कोर्ट में हलफनामा दाखिल किया है. पुलिस ने प्रदर्शन करने वाले लोगों पर ज्यादा बल प्रयोग करने के आरोपों को खारिज किया है. साथ ही पुलिस ने फेशियल रिकग्निशन टेक्नोलॉजी के इस्तेमाल को लेकर अपनी स्थिति साफ कर दी है.
DCP सचिन शर्मा की ओर से दाखिल हलफनामे में कहा गया है कि पुलिस ने तब ही बल का इस्तेमाल किया, जब प्रदर्शनकारी कथित तौर पर हिंसक और बेकाबू हो गए. पुलिस के अनुसार, इस दौरान कई बैरिकेड्स तोड़ दिए गए और प्रदर्शन करने वाले लोग संसद की ओर बढ़ने की कोशिश कर रहे थे.
पुलिस ने कहा कि स्थिति को कंट्रोल करने के लिए बल का इस्तेमाल किया गया. हलफनामा उन याचिकाओं के जवाब में दाखिल किया गया है, जिनमें प्रदर्शन के दौरान पुलिस की कथित कार्रवाई की जांच की मांग की गई थी. दिल्ली पुलिस ने कहा कि पूरी कार्रवाई का उद्देश्य उस समय स्थिति को कंट्रोल करना और कानून-व्यवस्था बनाए रखना था.
फेशियल रिकग्निशन टेक्नोलॉजी को लेकर पुलिस ने क्या कहा?
पुलिस ने बताया कि प्रदर्शन के दौरान इस्तेमाल की गई तकनीक हर व्यक्ति की प्रोफाइल तैयार नहीं करती. पुलिस का कहना है कि सिस्टम का इस्तेमाल केवल उन लोगों की पहचान से जुड़ी जानकारी हासिल करने के लिए किया जाता है, जिनका पहले से कोई आपराधिक रिकॉर्ड मौजूद है. दिल्ली पुलिस ने कहा कि इस तकनीक का उद्देश्य प्रदर्शन में शामिल सभी लोगों की निगरानी करना नहीं था. पुलिस ने सुप्रीम कोर्ट में दाखिल हलफनामे में बड़े पैमाने पर निगरानी किए जाने के आरोपों से इनकार किया है.
सोमवार देर रात दाखिल किए गए जवाबी हलफनामे में दिल्ली पुलिस ने कहा कि पुलिस कमिश्नर द्वारा बनाई गई स्पेशल इन्वेस्टिगेशन टीम (SIT) केवल गंभीर आपराधिक बैकग्राउंड वाले लोगों की ही जांच करेगी. पुलिस ने आगे बताया कि उन प्रदर्शनकारियों के खिलाफ कोई जांच नहीं होगी, जो उन 2873 लोगों में शामिल नहीं हैं. वहीं जिन पर हत्या, हत्या की कोशिश, डकैती, रेप, POCSO जैसे गंभीर आरोप हैं.सुप्रीम कोर्ट उन याचिकाओं पर सुनवाई कर रहा है, जिसमें विरोध वाली जगह पर पुलिस द्वारा बल प्रयोग करने का आरोप लगाया गया.
इसका इस्तेमाल शांतिपूर्ण प्रदर्शनकारियों की अंधाधुंध निगरानी या उनकी निजी जानकारी इकट्ठा करने के लिए भी नहीं किया जाता है, जब तक कि उनका कोई पुराना आपराधिक रिकॉर्ड न हो. फेशियल रिकग्निशन सिस्टम सिर्फ उन्हीं चेहरों को कैप्चर करता है जो पहले के अपराधों के मामलों में पहले से ही रिकॉर्डेड हैं.
पुलिस ने बताया कि फेशियल रिकग्निशन सिस्टम के नतीजे के आधार पर कोई कार्रवाई नहीं की जाती है. ये सिस्टम भीड़ में किसी ऐसे व्यक्ति की पहचान करने का पहला कदम है, जिसका क्रिमिनल रिकॉर्ड हो. चेहरा पहचाने जाने के बाद, उस व्यक्ति की फील्ड वेरिफिकेशन की जाती है, क्योंकि उसकी जानकारी पहले से ही पुलिस रिकॉर्ड में होती है. अगर फील्ड वेरिफिकेशन में ये पता चलता है कि वो व्यक्ति असल में उस जगह पर मौजूद था, तो कार्रवाई की जाती है.
दिल्ली पुलिस के अनुसार, फेशियल रिकग्निशन सिस्टम ऐसे लोगों का डेटा रिकॉर्ड नहीं करता, जिनका कोई आपराधिक रिकॉर्ड नहीं है. पुलिस के रिकॉर्ड में मुख्य रूप से उन आरोपियों के चेहरे और जानकारी होती है, जिन पर गंभीर अपराधों के मामले दर्ज हैं. छोटे मामलों, जैसे ट्रैफिक चालान या सामान्य नियमों के उल्लंघन करने वालों की जानकारी इस सिस्टम में शामिल नहीं की जाती.
कितने हिस्ट्री की हुई पहचान?
पुलिस ने बताया कि फेशियल रिकग्निशन सिस्टम का इस्तेमाल करके, पुराने क्रिमिनल रिकॉर्ड वाले 2,873 लोगों की पहचान की गई थी. इनकी जानकारी पुलिस के ऑफिशियल डेटाबेस में मौजूद रिकॉर्ड से मिलती जुलती थी. इसमें क्राइम कुंडली डेटाबेस से पहचाने गए 2,402 लोग और डोजियर रिकॉर्ड से पहचाने गए 471 लोग शामिल हैं. पुलिस ने बताया कि इनमें से 92 लोग 10 से ज़्यादा मामलों में शामिल हैं. इनमें से 47 हिस्ट्री-शीटर हैं.
पुलिस ने हलफनामें में बताया कि रिकॉर्ड से पता चलता है कि ये लोग पहले भी गंभीर आपराधिक मामलों में शामिल रहे हैं, जिनमें हत्या, हत्या की कोशिश, डकैती, लूट, रेप, POCSO एक्ट के तहत अपराध, महिलाओं के खिलाफ अपराध, आर्म्स एक्ट का उल्लंघन, अपहरण, झपटमारी, नारकोटिक ड्रग्स एंड साइकोट्रोपिक सब्सटेंस एक्ट के तहत अपराध शामिल हैं.
ये सरकारी रिकॉर्ड बताते हैं कि FRS वाली गाड़ियों की तैनाती ने बड़ी भीड़ में से आपराधिक बैकग्राउंड वाले लोगों की पहचान करने में अधिकारियों की मदद की. इससे पुलिस को समय रहते एहतियाती कदम उठाने में मदद मिली, जिससे कानून-व्यवस्था बनी रहे. साथ ही जो लोग शांतिपूर्ण तरह से प्रदर्शन कर रहे थे और आम जनता की सुरक्षा का भी ध्यान रखा गया.
पुलिस ने आगे बताया कि 20 जुलाई से 26 जुलाई के बीच प्रदर्शन वाली जगह और उसके आसपास के अलग-अलग पुलिस स्टेशनों में गाड़ी चोरी के 7 मामले, चोरी के 67 मामले और गुमशुदगी की 123 रिपोर्ट दर्ज की गईं थी. इससे ये साफ पता चलता है कि प्रदर्शन में उपद्रवी, अपराधी और असामाजिक तत्व घुस आए थे.
FRS को लेकर गलत बातें भी फैलाई गई हैं
दिल्ली पुलिस ने दाखिल हलफनामे में कहा कि ये दावा गलत है कि सिस्टम के जरिए लोगों का बायोमेट्रिक डेटा जुटाया जा रहा है, आधार की जानकारी के आधार पर प्रदर्शनकारियों को बुलाया जा रहा है या उनका डेटा निजी कंपनियों को दिया जा रहा है.
पुलिस के अनुसार, सिस्टम में गंभीर आपराधिक मामलों में आरोपी लोगों की जानकारी का इस्तेमाल किया जाता है. ऐसे लोगों का बायोमेट्रिक रिकॉर्ड पहले से ही पुलिस के पास कानूनी प्रक्रिया के तहत मौजूद रहता है. पुलिस ने कहा कि किसी प्रदर्शनकारी को आधार कार्ड या किसी दूसरे पहचान के आधार पर बुलाए जाने की बात सही नहीं है. हलफनामे में पुलिस ने ये भी कहा कि तकनीक का इस्तेमाल शांतिपूर्ण प्रदर्शनकारियों की सुरक्षा के लिए किया जा रहा है, जिससे गंभीर अपराधों में शामिल लोगों की पहचान की जा सके.
पुलिस ने प्रदर्शन के दौरान हुई घटनाओं से जुड़े रिकॉर्ड का भी जिक्र किया. इनमें खुफिया जानकारी, तैनाती के आदेश, भीड़ नियंत्रण की योजना, CCTV फुटेज, बॉडी-वॉर्न कैमरा रिकॉर्डिंग, वायरलेस लॉग और मेडिकल रिकॉर्ड शामिल हैं. पुलिस के अनुसार, प्रदर्शन के दौरान पुलिस और सुरक्षा बलों पर कथित हमले, सरकारी संपत्ति को नुकसान और हिंसा से जुड़े वीडियो भी सुरक्षित रखे गए हैं.
Bureau Report
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