दुनिया का दूसरा सबसे बड़ा चीनी उत्पादक देश भारत चीनी की बढ़ती कीमत से जूझ रहा है. फेस्टिव सीजन से पहले भारत में चीनी के बढ़ते दाम ने सरकार की चिंता बढ़ा दी है. विपक्षी दलों के हमले शुरू हो गए हैं. जो बहस अब तक तेल और LPG पर हो रही थी, अब उसकी जगह चीनी की किल्लत ने ले ली है. मुद्दा इसलिए भी अहम है कि भारत खुद चीनी का बड़ा प्रोड्यूसर देश है. बावजूद इसके बीते दो महीनों में चीनी दाम में 40% से अधिक का इजाफा हुआ है. 46-48 रुपये किलो बिकने वाली चीनी आज 70 रुपये किलो तक पहुंच चुकी है. आरोप लग रहे हैं कि इथेनॉल में गन्ने के इस्तेमाल की वजह से देश में चीनी की कमी हो गई और दाम बढ़ गए.
क्या इथेनॉल की वजह से महंगी हो रही है चीनी?
28 जुलाई को केंद्र सरकार ने प्रेस रिलीज जारी कर दावा किया कि देश में चीनी की कोई कमी नहीं है, लेकिन 20 अगस्त को सरकार ने 10 लाख मीट्रिक टन ड्यूटी फ्री शुगर के आयात का ऐलान कर दिया. 10 सालों में पहली बार है, जब भारत विदेशों से रॉ-शुगर का आयात कर रहा है. आखिर सरकार ने कहां चूक हुई कि दुनिया के दूसरे सबसे बड़े चीनी और गन्ना उत्पादक देश को किल्लत का सामना करना पड़ रहा है. विदेशों से चीनी आयात करना पड़ रहा है, सरकार ने कहां चूक हुई है ?
सरकार का दावा- इथेनॉल से नहीं हुई चीनी की किल्लत
चीनी के बढ़ते दाम के बाद आरोप लगने लगे कि इथेनॉल में गन्ने का इस्तेमाल होने से चीनी पेराई के लिए गन्ने की कमी हो गई, जिससे चीनी का उत्पादन कम हुआ. मांग और सप्लाई में असंतुलन की वजह से चीनी के दाम बढ़ रहे हैं. इन आरोपों पर 21 अगस्त को सरकार ने फिर से बयान दिया और आंकड़े पेश किए. सरकारी दावे के मुताबिक इथेनॉल के लिए इस्तेमाल होने वाली चीनी का हिस्सा 2022-23 में लगभग 12% से घटकर 2025-26 में लगभग 9% रह गया है.अब अगला सवाल अगर इथेनॉल नहीं, तो फिर क्यों बिगड़ा चीनी का हिसाब-किताब?
चीनी की कीमत बढ़ने के पीछे कौन-कौन से फैक्टर्स जिम्मेदार ?
मौसम की मार से गिरा गन्ने का उत्पादन: अल नीनो के प्रभाव और कमजोर मानसून की वजह से गन्ने का उत्पादन गिरा है. गन्ने के फसल को काफी पानी की जरूरत होती है. गन्ने की 80 फीसदी खेती उत्तर प्रदेश, कर्नाटक, महाराष्ट्र में होती है. कमजोर मानसून से उत्पादन पर असर पड़ा है. मानसून के अलावा यूपी में गन्ने की CO-0238 वेराइटी में गेरुआ नाम के रोग की वजह से फसल को भारी क्षति हुई. इसी तरह से इस साल गन्ने में रेड रॉट और टॉप बोरर बीमारी ने चीनी के उत्पादन को प्रभावित किया. फसल क्षति के साथ-साथ गन्ने से शुगर रिकवरी रेट भी गिरा है. यानी पहले गन्ने के रस से जितना चीनी निकलता था, अब वो कम हो गया है. जिससे शुगर प्रोडक्शन में भारी कमी आई है. मौजूदा सीजन में चीनी का उत्पादन लगभग 306 एलएमटी होने की उम्मीद है, जबकि गन्ना उगाने वाले राज्यों का शुरुआती अनुमान लगभग 343 एलएमटी था. सरकारी आंकड़ों के मुताबिक, भारत में हर साल औसतन 300 से 350 लाख टन कुल चीनी का उत्पादन होता है और करीब 280 लाख टन खपत होता है.यानी जितना भारत चीनी तैयार करता है, उतना खुद इस्तेमाल कर लेता है.
वैश्विक बाजार में चीनी की कमी :
अल-नीनो इफेक्ट दुनियाभर में दिखा है. ब्राजील में भी गन्ने के उत्पादन में 3 फीसदी तक की गिरावट देखी गई है. इस बीच ब्राजील ने अपनी हर दो हफ्ते में आने वाली गन्ने की फसल और उत्पादन रिपोर्ट जारी करने पर भी रोक लगा दी है, जिससे सप्लाई की स्थिति को समझने में परेशानी हो रही है. इतना ही नहीं, दुनिया के सबसे बड़े गन्ना उत्पादक देश ब्राजील ने जून में 58% गन्ने के रस का इस्तेमाल इथेनॉल बनाने में किया है. चीनी सप्लाई में कमी से ग्लोबल मार्केट में चीनी के दाम बढ़े हैं. 2026-27 के लिए वैश्विक स्तर पर चीनी की कमी का अनुमान लगभग 33 एलएमटी लगाया गया है. कीमत की बात करें, तो अंतरराष्ट्रीय बाज़ार में चीनी की कीमतें 30 जून 2026 को 474 डॉलर प्रति टन थी, जो 20 अगस्त 2026 को बढ़कर 552 डॉलर प्रति टन पर पहुंच गई. ग्लोबल मार्केट में चीनी के दाम में 16% का इजाफा हुआ है.
क्या निर्यात रोकने का फैसला देरी से लिया गया ?
विश्व का दूसरा सबसे बड़ी चीनी उत्पादक देश भारत ने वित्त वर्ष 2020-21 में 70 लाख मीट्रिक टन, 2021-22 में 110 लाख मीट्रिक टन , 2022-23 में 63 लाख मीट्रिक टन चीनी का निर्यात किया. नवंबर 2025 में भारत ने 15 लाख टन चीनी का एक्सपोर्ट किया. फरवरी 2026 में इसमें 5 लाख टन की बढ़ोतरी कर 20 लाख टन कर दिया गया, जिसमें से 6 लाख टन का निर्यात किया जा चुका है. 13 मई 2026 को सरकार ने 30 सितंबर तक निर्यात को पूरी तरह से प्रतिबंधित कर दिया है. सवाल उठता है कि जब चीनी का उत्पादन गिर रहा था, तो निर्यात रोकने के फैसले में इतनी देरी क्यों हुई?
भारत को चीनी आयात करने की जरूरत क्यों पड़ी है ?
चीनी के गिरते प्रोडक्शन की वजह से एक दशक में पहली बार भारत को चीनी का आयात करना पड़ रहा है. 1 अक्टूबर से चीनी का नया सीजन शुरू होता है. सीजन की शुरुआती स्टॉक घटकर लगभग 33-34 लाख टन रहने की उम्मीद है. जबकि एक साल पहले यह 50 लाख टन था. जबकि कमोडिटी एक्सपर्ट मानते हैं कि भारत के पास 60 लाख टन का स्टैंडर्ड क्लोजिंग स्टॉक होना चाहिए. ऐसे में शुगर स्टॉक में कमी के चलते भारत को बाहर से चीनी का आयात करना पड़ रहा है.
क्या सरकार ने इन फैसलों से गिरेंगे चीनी के दाम?
1. सरकार ने चीनी के निर्यात को रोक दिया.
2. 10 लाख टन ड्यूटी फ्री चीनी आयात का फैसला किया
3. जमाखोरी रोकने के लिए सिर्फ 15 दिन का स्टॉक रखने का नियम बनाया गया
अब सवाल ये है कि क्या इन फैसलों से चीनी के दाम गिरेंगे? Prithvi Finmart के डायरेक्टर, कमोडिटी और करेंसी रिसर्च के हेड मनोज कुमार जैन कहते हैं कि…
बड़ी बातें…
सरकार ने स्थिति का आंकलन करने में देरी कर दी. चीनी निर्यात को रोकने का फैसला पहले करना चाहिए था. जमाखोरी को लेकर सरकार ने उस सख्ती से कदम नहीं उठाए, जिससे स्थिति पर काबू पाया जा सके. मौजूदा स्थिति में पैनिंक बाइंग एक बड़ी वजह है, जिसकी वजह से चीनी के मांग और दाम दोनों बढ़े हैं. अगर बात सरकार के फैसलों की करें, तो ये कदम कीमतों को नियंत्रित कर सकती है, लेकिन दाम में अचानक से गिरावट की उम्मीद कम है. वैश्विक बाजार में भी चीनी के दाम बड़ रहे हैं और कमजोर मानसून की वजह से अगले साल भी गन्ने की फसल पर असर दिख सकता है.
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