काम सिर्फ उतना ही, जितने के पैसे, भारत में ‘Effort Recession’ की शुरुआत; 10 में से 6 कंपनियां परेशान!

काम सिर्फ उतना ही, जितने के पैसे, भारत में 'Effort Recession' की शुरुआत; 10 में से 6 कंपनियां परेशान!

कॉर्पोरेट जगत में एक ऐसा काम होता है, जिसे कोई भी कंपनी अपने कर्मचारियों से जबरन नहीं करवा सकती है बिना कहे देर रात तक रुकना, अपनी जिम्मेदारी से बाहर जाकर किसी कलीग की समस्या सुलझाना या किसी प्रोजेक्ट को सफल बनाने के लिए अपनी क्षमता से बढ़कर योगदान देना, इसे मैनेजमेंट की भाषा में ‘डिस्क्रीशनरी एफर्ट’ (Discretionary Effort) कहा जाता है जिसका हिंदी में मतलब स्वैच्छिक प्रयास है. यही वो एक्स्ट्रा पुश है जो एक साधारण कर्मचारी को एक लीडर बनाता है. मगर भारतीय कॉर्पोरेट सेक्टर से अब ये ‘एक्स्ट्रा पुश’ गायब हो रहा है.

एक रिपोर्ट के जरिए खुलासा किया गया है कि कर्मचारी दफ्तर आ रहे हैं, अपना तय काम कर रहे हैं और लॉग-ऑफ कर रहे हैं. न कम, न ज्यादा और ये ही एक नया वर्क कल्चर बनता जा रहा है. पहले जहां कई कर्मचारी बिना कहे अतिरिक्त जिम्मेदारियां उठाते थे, वहीं अब ऐसी पहल लगातार कम होती दिख रही है. 

क्या है ‘Effort Recession’?

दरअसल, हर नौकरी में कुछ ऐसे काम होते हैं जिन्हें कोई नियम या आदेश लागू नहीं करवा सकता. जैसे किसी समस्या को खुद आगे बढ़कर सुलझाना, जरूरत पड़ने पर टीम की मदद करना या समय खत्म होने के बाद भी किसी जरूरी काम को पूरा करना. कर्मचारियों की यही अतिरिक्त मेहनत डिस्क्रीशनरी एफर्ट कहलाती है जिसमें अब लगातार कमी आने लगी है और उसे Effort Recession कहा जा रहा है.

रिपोर्ट में हुआ खुलासा

‘ग्रेट प्लेस टू वर्क इंडिया’ की साल 2026 की एक हालिया स्टडी ने इस चौंकाने वाले ट्रेंड को ‘एफर्ट रिसेशन’ (प्रयासों में मंदी) का नाम दिया है. आंकड़े गवाह हैं कि देश की 10 में से 6 कंपनियां (सर्वेक्षण में शामिल 380 में से 240 संगठन यानी लगभग 63%) पिछले एक साल में अपने कर्मचारियों के इस डिस्क्रीशनरी एफर्ट में औसतन 5% की गिरावट देख चुकी हैं और इससे बेहद परेशान हैं.

किन सेक्टरों में सबसे ज्यादा असर?

रिटेल सेक्टर सबसे ज्यादा प्रभावित दिखाई दिया. यहां 88% कंपनियों ने कर्मचारियों के अतिरिक्त प्रयास में कमी दर्ज की. इसके बाद आईटी और प्रोफेशनल सर्विसेज सेक्टर रहे, जहां 77-77% कंपनियों ने यही रुझान देखा. कंस्ट्रक्शन और रियल एस्टेट में यह आंकड़ा 71% रहा. दूसरी ओर फाइनेंशियल सर्विसेज में हालात अपेक्षाकृत बेहतर रहे, जबकि मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर सबसे मजबूत साबित हुआ. इस सेक्टर में सिर्फ 44% कंपनियों ने गिरावट की बात कही और औसत कमी भी सिर्फ 3% रही.

काम सिर्फ उतना ही, जितने के पैसे

रिपोर्ट का सबसे अहम निष्कर्ष नेतृत्व से जुड़ा है. जिन कर्मचारियों को लगता है कि उनके मैनेजर उनकी परवाह करते हैं और उन्हें अच्छे पैसे मिलेंगे वो उस हिसाब से काम कर रहे हैं. उनका अतिरिक्त प्रयास का स्तर 99 फीसदी तक पहुंच जाता है. वहीं, जहां ऐसा भरोसा नहीं बन पाता, वहां ये सिर्फ 29 फीसदी रह जाता है. इसी तरह प्रेरणादायक नेतृत्व भी बड़ा फर्क पैदा करता है. जब कर्मचारी अपने लीडर से प्रेरित महसूस करते हैं तो उनका अतिरिक्त योगदान 98 फीसदी तक पहुंच जाता है, जबकि प्रेरणा की कमी होने पर ये 32 फीसदी तक सिमट जाता है.

Gen Z और AI ने बढ़ाई चुनौती 

भारतीय कार्यबल में Gen Z कर्मचारियों की संख्या तेजी से बढ़ रही है. रिपोर्ट के अनुसार अब वो कुल वर्कफोर्स का लगभग 26 फीसदी हिस्सा हैं. इसी दौरान कंपनियां आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) से जुड़े बदलावों का भी सामना कर रही हैं. लगभग 58 प्रतिशत CHRO का कहना है कि उन्हें एक साथ AI और नई पीढ़ी की अपेक्षाओं के अनुसार कार्यस्थल को ढालना पड़ रहा है. वहीं, लगभग आधे HR प्रमुख मानते हैं कि वो अभी भी Gen Z कर्मचारियों की प्राथमिकताओं को पूरी तरह नहीं समझ पाए हैं.

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