बॉम्बे हाई कोर्ट ने एक बेहद कड़ा और ऐतिहासिक फैसला सुनाते हुए असहमति की आवाज को दबाने के लिए पुलिस शक्तियों के दुरुपयोग पर मुंबई पुलिस की तीखी आलोचना की है. कोर्ट ने सरकार के खिलाफ शांतिपूर्ण विरोध प्रदर्शन आयोजित करने वाले एक राजनीतिक कार्यकर्ता को शहर से बाहर (तड़ीपार) करने के पुलिसिया आदेश को सिरे से खारिज कर दिया.
मामले की सुनवाई करते हुए जस्टिस माधव जे. जामदार ने पुलिस के रवैये पर गहरा आक्रोश व्यक्त किया. उन्होंने कड़े शब्दों में पूछा कि क्या पुलिस सिर्फ सरकार के खिलाफ आवाज उठाने पर नागरिकों के खिलाफ आपराधिक मामले दर्ज करके उन्हें सरकार का गुलाम बनाने की कोशिश कर रही है? हाई कोर्ट ने पुलिस महकमे को आईना दिखाते हुए सख्त लहजे में याद दिलाया कि वे जनता के सेवक हैं, न कि बड़े सरकारी अधिकारियों या सत्ताधीशों के. कोर्ट ने साफ किया कि राजनीतिक नेताओं के खिलाफ शांतिपूर्ण विरोध प्रदर्शन करना और नारे लगाना हर भारतीय नागरिक का बुनियादी और लोकतांत्रिक अधिकार है.
क्या है पूरा मामला? क्यों किया गया था तड़ीपार?
ये पूरी कानूनी लड़ाई तब शुरू हुई जब सोशलिस्ट डेमोक्रेटिक पार्टी ऑफ इंडिया (SDPI) के 49 वर्षीय जनरल सेक्रेटरी सईद अहमद अब्दुल वाहिद चौधरी ने मुंबई पुलिस के एक साल के एक्सटर्नमेंट ऑर्डर (तड़ीपार आदेश) को अदालत में चुनौती दी. मुंबई पुलिस ने अपने इस सख्त कदम को सही ठहराने के लिए दलील दी थी कि 2019 से 2024 के बीच चौधरी के खिलाफ कई पुलिस शिकायतें दर्ज थीं.
ये शिकायतें इसलिए दर्ज हुई थीं क्योंकि चौधरी ने नागरिकता संशोधन अधिनियम (CAA), राष्ट्रीय नागरिक रजिस्टर (NRC), बाबरी मस्जिद और ज्ञानवापी मस्जिद जैसे बेहद संवेदनशील और विवादित राष्ट्रीय मुद्दों पर पुलिस की अनुमति के बिना शांतिपूर्ण प्रदर्शन किए थे. इन प्रदर्शनों के दौरान प्रदर्शनकारियों ने ‘BJP सरकार मुर्दाबाद’ और ‘अमित शाह मुर्दाबाद’ जैसे राजनीतिक नारे लगाए थे. चौधरी के वकीलों ने अदालत में दलील दी कि पुलिस का यह बैन पूरी तरह से राजनीति से प्रेरित था, ताकि महत्वपूर्ण निकाय (कॉर्पोरेशन) चुनावों के दौरान उन्हें शहर और जनता से दूर रखा जा सके और जायज लोकतांत्रिक विरोध को दबाया जा सके.
तड़ीपार कानून अपराधियों के लिए, आम नागरिकों के लिए नहीं: हाई कोर्ट
भारत में ‘देश निकाला’ या तड़ीपार करने का आदेश (Externment Order) एक बेहद गंभीर और असाधारण कानूनी कदम है, जिसका इस्तेमाल आमतौर पर समाज के लिए खतरनाक अपराधियों, गैंगस्टरों या आदतन बदमाशों को किसी इलाके से अस्थायी रूप से दूर रखने के लिए किया जाता है. चौधरी के वकीलों ने अदालत में साबित किया कि उनके मुवक्किल पर दर्ज पिछले मामले बेहद मामूली प्रकृति के थे, जिनमें अधिकतम केवल एक महीने की जेल की सजा का प्रावधान है. ऐसे छोटे-मोटे राजनीतिक मामलों के आधार पर किसी भी नागरिक को देश में कहीं भी आने-जाने की आजादी से वंचित नहीं किया जा सकता. हालांकि, राज्य सरकार ने पुलिसिया कार्रवाई का बचाव करते हुए तर्क दिया कि चूंकि विरोध प्रदर्शन पुलिस की मनाही के बावजूद किए गए थे, इसलिए यह कार्रवाई सही थी.
आर्टिकल 19 और 21 सर्वोच्च; कोर्ट ने तय की लक्ष्मण रेखा
सभी दलीलों को सुनने के बाद जस्टिस जामदार ने फैसला सुनाया कि मुंबई पुलिस की ये कार्रवाई पूरी तरह से गलत नीयत से की गई थी और इसका कोई ठोस कानूनी आधार नहीं था. रिकॉर्ड पर ऐसा कोई सबूत नहीं है जिससे यह साबित हो कि चौधरी से जनता की सुरक्षा या संपत्ति को कोई खतरा था. हाई कोर्ट ने रेखांकित किया कि भारतीय संविधान के आर्टिकल 19 (अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता) और आर्टिकल 21 (सम्मान के साथ जीने का अधिकार) के तहत नागरिकों को अपनी बात रखने और सरकार की नीतियों से असहमति जताने का अधिकार मिला हुआ है.
अदालत ने अपने फैसले में यह निष्कर्ष निकाला कि सिर्फ सरकारी नीतियों के खिलाफ आवाज उठाने पर किसी व्यक्ति से उसके ये मौलिक अधिकार छीनना एक बेहद खतरनाक मिसाल कायम करता है. इस ऐतिहासिक फैसले के जरिए कोर्ट ने एक बार फिर साफ कर दिया कि शांतिपूर्ण असहमति ही एक जीवंत और स्वस्थ लोकतंत्र का सबसे मजबूत स्तंभ है.
Bureau Report
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