जंतर-मंतर पर प्रदर्शनकारियों पर पुलिस कार्रवाई को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने अहम टिप्पणी की है. चीफ जस्टिस सूर्यकांत ने कहा कि शांतिपूर्ण विरोध-प्रदर्शन करना मौलिक अधिकार है. संविधान से मिले इस मौलिक अधिकार की रक्षा की जानी चाहिए. सिर्फ इसलिए कि कहीं आंदोलन हो रहा है, पुलिस लाठीचार्ज या जरूरत से ज्यादा बल प्रयोग नहीं कर सकती. चीफ जस्टिस ने कहा कि लोकतांत्रिक प्रक्रिया के लिए आत्म-अनुशासन जरूरी है. सिर्फ आंदोलन होने से लाठीचार्ज नहीं किया जा सकता.
हर जान कीमती
बेंच के दूसरे सदस्य जस्टिस बागची ने कहा कि हमारे लिए हर जान कीमती है. पुलिस और प्रदर्शनकारियों, दोनों में से जो भी घायल हुए हैं, हम दोनों के लिए चिंतित हैं.
आज कोर्ट में क्या हुआ
चीफ जस्टिस सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली बेंच ने यह टिप्पणी उस वक्त की, जब जंतर-मंतर पर विरोध-प्रदर्शन से जुड़ी कुछ याचिकाएं उनके सामने रखी गईं.
याचिकाकर्ताओं की ओर से वकील फौजिया शकील और विकास सिंह ने कोर्ट के सामने यह मामला उठाया. इस दौरान एक वकील ने कहा कि प्रदर्शन के दौरान पुलिसकर्मी भी घायल हुए हैं और उनकी बात भी सुनी जानी चाहिए. इस पर जस्टिस जॉयमाल्य बागची ने कहा कि हर व्यक्ति की जान महत्वपूर्ण है, चाहे वह कोई भी हो. हम सरकार से यह भी जवाब मांग सकते हैं कि हिंसक प्रदर्शनकारियों से घायल हुए पुलिसकर्मियों को पर्याप्त सुरक्षा उपकरण क्यों उपलब्ध नहीं कराए गए.
पूरे देश के लिए तय प्रोटोकॉल जरूरी
चीफ जस्टिस ने कहा कि प्रदर्शन के लिए पूरे देश में एक तय प्रोटोकॉल होना चाहिए. प्रदर्शन के लिए उचित जगह होनी चाहिए, ताकि बेवजह रोक-टोक न हो. अगर प्रदर्शन में असामाजिक तत्व हों, तो उनसे अलग तरीके से निपटा जा सकता है. यह सिर्फ दिल्ली का मामला नहीं है, जरूरत है कि पूरे देश में एक समान नियम हो.
सरकार की ओर से पेश सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने भी कहा कि केंद्र सरकार इस मामले में निष्पक्ष तरीके से अदालत की सहायता करेगी. बहरहाल, सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि वह छात्र प्रदर्शनकारियों पर पुलिस कार्रवाई से जुड़ी सभी याचिकाओं पर एक साथ 28 जुलाई को सुनवाई करेगी.
Bureau Report
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