बीजेपी की नई ‘वुमेन पावर’, जमीन पर दिखेगा दम! कितना बदलेगा पार्टी के संगठन का नक्शा?

बीजेपी की नई 'वुमेन पावर', जमीन पर दिखेगा दम! कितना बदलेगा पार्टी के संगठन का नक्शा?

BJP New Team: बीजेपी के ‘बॉस’ नितिन नबीन ने सोमवार को अपनी नई टीम का ऐलान किया तो सियासी हलकों में हलचल तेज हो गई. बीजेपी की इस नई टीम में 65 नए चेहरे हैं, जिसमें 12 महिलाएं हैं यानी 18 फीसदी हिस्सेदारी. इनमें सबसे उम्रदराज वसुंधरा राजे सिंधिया हैं, जो 73 साल की हैं.साल 2027 चुनावी साल है, लिहाजा उत्तर प्रदेश से 8, उत्तराखंड से 4, गुजरात से 4, पंजाब से 2 यानी कुल मिलाकर 18 नए चेहरे. लेकिन बीजेपी की ‘नवीन’ टीम में महिलाओं का रोल बेहद खास रहने वाला है. महिलाओं की भागीदारी एक और अहम बात है.

राष्ट्रीय उपाध्यक्ष के 13 पदों में से छह पदों पर महिलाएं हैं. वसुंधरा राजे, स्मृति ईरानी और डी. पुरंदेश्वरी जैसी प्रमुख नेताओं के शामिल होने से पार्टी के वरिष्ठ निर्णय लेने वाले ढांचे में महिलाओं की मौजूदगी और मजबूत हुई है. राजनीतिक जानकारों का कहना है कि महिलाओं की ज्यादा भागीदारी रणनीतिक रूप से भी अहम है क्योंकि महिला वोटर चुनावी लिहाज से एक बहुत महत्वपूर्ण वर्ग बन गई हैं. इससे पहले कि हम आगे बढ़ें, आपको बीजेपी की नई टीम के महिला चेहरों से रूबरू करा देते हैं.

स्मृति ईरानी 

2024 में अमेठी लोकसभा सीट कांग्रेस के किशोरी लाल शर्मा से हारने वालीं स्मृति ईरानी को आठ राष्ट्रीय महासचिवों में से एक बनाया गया है. इसके साथ ही पार्टी के मुख्य संगठनात्मक ढांचे में उनकी वापसी हुई है.वह शिक्षा, महिला एवं बाल विकास और केंद्रीय कपड़ा मंत्रालय का कामकाज संभाल चुकी हैं.

वसुंधरा राजे सिंधिया

राजस्थान की पूर्व मुख्यमंत्री और दो बार इस पद पर रह चुकीं वसुंधरा राजे को पार्टी का राष्ट्रीय उपाध्यक्ष बनाए रखा गया है. इस तरह, वे पार्टी के सबसे वरिष्ठ संगठनात्मक पदों में से एक पर बनी हुई हैं. राजे हिंदी भाषी क्षेत्र में बीजेपी की सबसे प्रमुख महिला नेताओं में से एक बनी हुई हैं.

डी पुरंदेश्वरी (आंध्र प्रदेश)

राजमुंदरी की सांसद और दिवंगत एनटीआर की बेटी को राष्ट्रीय उपाध्यक्ष बनाया गया है. पुरंदेश्वरी पहले बीजेपी की आंध्र प्रदेश इकाई की प्रमुख रह चुकी हैं और मानव संसाधन विकास और वाणिज्य के लिए केंद्रीय मंत्री का पद भी संभाल चुकी हैं.

रेखा वर्मा (उत्तर प्रदेश)

धौरहरा से दो बार सांसद रहीं वर्मा राष्ट्रीय उपाध्यक्ष बनी रहेंगी, इस पद पर वह 2019 से हैं, और वह उत्तराखंड के लिए पार्टी की सह-प्रभारी भी हैं.

वर्षाबेन दोषी (गुजरात)

2007 और 2017 के बीच वधवान निर्वाचन क्षेत्र से गुजरात की पूर्व विधायक रहीं दोषी को राष्ट्रीय उपाध्यक्ष बनाया गया है, जिससे सूची में पश्चिमी भारत का प्रतिनिधित्व भी शामिल हो गया है.

भारती प्रवीण पवार (महाराष्ट्र)

पेशे से डॉक्टर और डिंडोरी की पूर्व सांसद पवार पहले स्वास्थ्य और परिवार कल्याण और जनजातीय मामलों की केंद्रीय राज्य मंत्री रह चुकी हैं. उन्हें अब राष्ट्रीय उपाध्यक्ष बनाया गया है.

मधुचंद्र कर (पश्चिम बंगाल)

कर पेशे से ऑन्कोलॉजिस्ट (कैंसर विशेषज्ञ)हैं. बीजेपी के छात्र विंग से आगे बढ़ीं और फिर पार्टी की पश्चिम बंगाल उपाध्यक्ष बनीं. उन्हें अब राष्ट्रीय उपाध्यक्ष बनाए रखा गया है, जो केंद्रीय संगठन में बंगाल के बढ़ते महत्व को दिखाता है.

कविता पाटीदार (मध्य प्रदेश)

ओबीसी समुदाय से आती हैं. 2022 से राज्यसभा सांसद और इंदौर जिला पंचायत की पूर्व अध्यक्ष पाटीदार को राष्ट्रीय सचिव नियुक्त किया गया है.

फांगनोन कोन्याक (नागालैंड)

नागालैंड की पहली महिला राज्यसभा सांसद और सदन के उपाध्यक्षों के पैनल में नियुक्त होने वाली पहली महिला कोन्याक को राष्ट्रीय सचिव बनाया गया है.

संगीता यादव (उत्तर प्रदेश)

बीजेपी महिला मोर्चा की नेशनल सेक्रेटरी और गोरखपुर की चौरी-चौरा सीट से विधानसभा चुनाव लड़ चुकीं यादव को अब पार्टी का नेशनल सेक्रेटरी बनाया गया है.

रूप कुमारी चौधरी (छत्तीसगढ़)

चौधरी को बीजेपी महिला मोर्चा का नेशनल प्रेसिडेंट बनाया गया है. वह ऐसे समय में पार्टी के महिला विंग की कमान संभाल रही हैं जब आने वाले विधानसभा चुनावों से पहले पार्टी अपनी पहुंच बढ़ा रही है.

प्रीति गांधी (महाराष्ट्र)

लंबे समय से महिला मोर्चा के सोशल मीडिया कामकाज की नेशनल इंचार्ज और महाराष्ट्र बीजेपी की प्रवक्ता रहीं गांधी को नेशनल सोशल मीडिया को-कन्वीनर नियुक्त किया गया है.

संगठन में बदलाव या चुनावी रणनीति?

अब जब आप चेहरों से वाकिफ हो चुके हैं तो सवाल उठ रहे हैं कि क्या बीजेपी की नई टीम में महिलाओं की बढ़ी हुई भागीदारी संगठन में आया कोई वास्तविक बदलाव है या इसकी मुख्य वजह चुनावी है.पिछले कई चुनावों में महिलाएं एक निर्णायक और स्वतंत्र वोट बैंक के तौर पर उभरी हैं. मध्य प्रदेश में ‘लाडली बहना’ जैसी खास कल्याणकारी योजनाओं, मुफ्त बस यात्रा, LPG सब्सिडी और डायरेक्ट बेनिफिट ट्रांसफर (DBT) ने यह साबित किया है कि महिला वोटर उन पार्टियों का सक्रिय रूप से समर्थन करती हैं जो उनके कल्याण को प्राथमिकता देती हैं.

संगठन में ऊंचे पदों पर महिलाओं की भागीदारी इस जुड़ाव को और मजबूत करती है. दूसरी ओर, महिलाओं को 33 फीसदी आरक्षण कानून के पारित होने के बाद, राजनीतिक पार्टियों पर तुरंत महिला नेताओं की एक ऐसी टीम तैयार करने का दबाव है जो आने वाले चुनावों में आरक्षित सीटों पर चुनाव लड़ सकें.दरअसल, बीजेपी 2027 ही नहीं, 2029 के लिए भी तैयारी में जुटी हुई है और महिलाओं को ज्यादा से ज्यादा तवज्जो देना भी उसी से जुड़ा हुआ है. पिछले कई चुनावों का गणित देखकर तो यही लगता है कि बीजेपी का महिलाओं को संगठन में ज्यादा प्रतिनिधित्व देने से महिला वोटरों के बीच पार्टी की चुनावी पहुंच बढ़ सकती है. इसके अलावा इससे उसका संगठन भी मजबूत होगा.

स्मृति ईरानी और वसुंधरा के लौटने से महिलाओं के बीच क्या संदेश जाएगा?

स्मृति ईरानी और वसुंधरा राजे बीजेपी की जमीनी, प्रभावशाली और मुखर नेताओं में गिनी जाती हैं. महिलाओं के बीच उनकी पहचान काफी मजबूत है. उनकी मौजूदगी का मकसद शहरी और ग्रामीण दोनों तरह की महिला वोटरों को आकर्षित करना है, जो निर्णायक नेतृत्व और जमीनी स्तर पर जुड़ाव को अहमियत देती हैं. उपाध्यक्ष के तौर पर वसुंधरा राजे को बनाए रखने से राज्य के नेतृत्व में महिलाओं की अगुआ के रूप में उनका कद बना रहता है, जिससे पारंपरिक और क्षेत्रीय महिला वोटर खासकर राजस्थान और पड़ोसी राज्यों में आकर्षित होती हैं.वह राजस्थान की मुख्यमंत्री भी रह चुकी हैं.

लिहाजा उनके लौटने से पार्टी का दबदबा महिला वोटरों के बीच स्पष्ट जाएगा. वसुंधरा राजे जैसे अनुभवी और क्षेत्रीय स्तर पर मजबूत नेताओं को बनाए रखने से पार्टी के स्थानीय गुटों और पारंपरिक वोट बैंक को भरोसा मिलता है कि वरिष्ठ नेताओं की अहमियत बनी हुई है और उन्हें राष्ट्रीय रणनीति में शामिल किया जा रहा है. चुनाव की ओर बढ़ रहे अहम राज्य उत्तर प्रदेश में स्मृति ईरानी को संगठनात्मक जिम्मेदारी सौंपना यह दिखाता है कि पार्टी राज्य के संगठन में सीधे तौर पर आक्रामक और सफल कैंपेन मैनेजरों को तैनात करना चाहती है.

स्मृति ईरानी ने 2014 में राहुल गांधी के खिलाफ चुनाव लड़ा था.तब उनको शिकस्त मिली थी. लेकिन उन्होंने कोई कसर नहीं छोड़ी और 2019 के चुनाव में एक बार फिर से उनको अमेठी से राहुल गांधी के खिलाफ मैदान में उतारा गया और उन्होंने इतिहास रचते हुए कांग्रेस के दिग्गज नेता को उनके ही गढ़ में शिकस्त देकर सियासी पंडितों को भी हैरान कर दिया था. हालांकि 2024 के चुनाव में उनको फिर हार मिली. तब से वह साइडलाइन चल रही थीं. इन महिला नेताओं की वापसी से एक बड़ा संदेश यह भी जाता है कि नेतृत्व के कई स्तरों पर महिलाओं की भागीदारी को सिर्फ दिखावटी भूमिकाओं तक सीमित रखने के बजाय, उसे संस्थागत रूप दिया जा रहा है.

अब अगला सवाल उठता है कि क्या BJP फैसले लेने वाले पदों पर महिलाओं की ज्यादा सार्थक भूमिका की ओर बढ़ रही है?

स्मृति ईरानी को राष्ट्रीय महासचिव के तौर पर राज्यों से जुड़े अहम कामकाज की जिम्मेदारी सौंपने जैसा कदम तो यही दिखाता है कि महिला नेताओं को सिर्फ दिखावटी पदों के बजाय अहम चुनावी अभियानों और रणनीतिक योजना बनाने जैसे अहम कामों में लगाया जा रहा है. बीजेपी में राष्ट्रीय उपाध्यक्ष का पद अक्सर सलाह देने या रणनीति बनाने वाला होता है. रोज़मर्रा के मुख्य प्रशासनिक अधिकार पारंपरिक रूप से पार्टी अध्यक्ष, महासचिव (संगठन) और प्रमुख महासचिवों के पास होते हैं. निर्णय लेने की असली शक्ति का पता इस बात से चलता है कि चुनाव प्रबंधन समितियों और टिकट-वितरण पैनल में कौन शामिल है.बड़े नेताओं के अलावा, युवा और क्षेत्रीय महिला नेताओं जैसे कविता पाटीदार और संगीता यादव को राष्ट्रीय सचिव बनाना, और फांगनोन कोन्याक व रूप कुमारी चौधरी को महिला मोर्चा की कमान सौंपना जमीनी और राष्ट्रीय, दोनों स्तरों पर काम करने का अनुभव बढ़ाने की बहु-स्तरीय कोशिश को दिखाता है.

क्या इस नई टीम के बनने से दूसरी पंक्ति की महिला नेताओं को आगे बढ़ने का और मौका मिलेगा?

अगर इस नेशनल टीम का ढांचा देखें तो उसमें  दूसरी पंक्ति की महिला नेताओं को आगे बढ़ाने की एक सोची-समझी रणनीति को दिखाता है. जहां स्मृति ईरानी और वसुंधरा राजे जैसे बड़े नाम लिस्ट में हैं तो वहीं परदे के पीछे की नियुक्तियां राष्ट्रीय, क्षेत्रीय और सामाजिक स्तरों पर काम करने की क्षमता को मजबूत करने की एक सोची-समझी रणनीति का संकेत देती हैं.वसुंधरा राजे के अलावा, उपाध्यक्ष पद की सूची में डी. पुरंदेश्वरी (आंध्र प्रदेश), डॉ. भारती प्रवीण पवार (महाराष्ट्र), रेखा वर्मा (उत्तर प्रदेश), वर्षाबेन दोशी (गुजरात), और डॉ. मधुचंद्र कर (पश्चिम बंगाल) जैसे अनुभवी क्षेत्रीय नेता शामिल हैं, जो पारंपरिक हिंदी-भाषी महिला नेताओं से परे पार्टी का कद और बढ़ा रही हैं.

Bureau Report

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