तीन तलाक (तलाक-ए-बिद्दत) को असंवैधानिक और गैरकानूनी घोषित किए जाने के बाद अब मुस्लिम समाज में प्रचलित बहुविवाह (Polygamy) और ‘निकाह हलाला’ की सदियों पुरानी प्रथा देश की सर्वोच्च अदालत की चौखट पर पहुंच गई है. सुप्रीम कोर्ट ने मुस्लिम पर्सनल लॉ के तहत पुरुषों को एक से अधिक शादियां (चार पत्नियां तक रखने) की कानूनी छूट को चुनौती देने वाली याचिकाओं पर केंद्र सरकार से औपचारिक जवाब मांगा है.
अदालत ने केवल जवाब मांगने तक ही खुद को सीमित नहीं रखा, बल्कि केंद्र से यह भी विचार करने को कहा है कि क्या धर्म से परे जाकर देश के सभी नागरिकों के लिए बहुविवाह की प्रथा को पूरी तरह समाप्त करने हेतु ठोस वैधानिक कदम उठाए जा सकते हैं. इस ऐतिहासिक पहल ने भारतीय न्याय प्रणाली में लैंगिक न्याय, संवैधानिक समानता और समान कानूनी संहिता को लेकर एक नई राष्ट्रीय बहस छेड़ दी है.
कानून की दोहरी व्यवस्था पर सवाल
इस पूरे कानूनी विवाद के केंद्र में भारतीय संविधान का अनुच्छेद 14 (समानता का अधिकार) और विभिन्न कानूनी संहिताओं के बीच का विरोधाभास है. वर्तमान में लागू भारतीय न्याय संहिता, 2023 (BNS) की धारा 82 (जिसने पूर्ववर्ती भारतीय दंड संहिता यानी IPC की धारा 494 का स्थान लिया है) के अनुसार, पहली शादी के कानूनी रूप से अस्तित्व में रहते हुए दूसरी शादी करना एक गंभीर गैर-जमानती अपराध है. गैर-मुस्लिम नागरिकों पर यह कानून सख्ती से लागू होता है और इसके तहत दोषी पाए जाने पर सात साल तक के कारावास का प्रावधान है. दूसरी ओर, मुस्लिम पर्सनल लॉ (शरीयत) एप्लीकेशन एक्ट, 1937 की धारा 2 मुस्लिम पुरुषों को अपनी शरीयत परंपराओं के तहत एक समय में चार पत्नियां तक रखने की वैधानिक छूट देती है.
याचिकाकर्ताओं का सबसे बड़ा सवाल यही है कि जब आपराधिक कानून देश के हर नागरिक पर समान रूप से लागू होता है, तो वैवाहिक जीवन और बहुविवाह के मामले में यह दोहरी व्यवस्था क्यों? एक ही कृत्य एक नागरिक के लिए सात साल की जेल का कारण बनता है, जबकि दूसरे समुदाय के नागरिक के लिए संरक्षित पर्सनल लॉ का अधिकार बन जाता है. यह संविधान द्वारा प्रदत्त समानता की मूल भावना का सीधा उल्लंघन है.
याचिकाकर्ताओं की मुख्य मांगें और दलीलें
इस मामले में भारतीय मुस्लिम महिला आंदोलन (BMMA) की सह-संस्थापक जकिया सोमन और नूरजहां सफिया नियाज समेत कई सामाजिक कार्यकर्ताओं और वरिष्ठ अधिवक्ताओं ने जनहित याचिकाएं (PIL) दायर की हैं. जकिया सोमन पूर्व में शायरा बानो बनाम यूनियन ऑफ इंडिया (तीन तलाक केस) में भी मुख्य याचिकाकर्ताओं में शामिल रही हैं. याचिकाकर्ताओं ने अदालत के समक्ष ये मुख्य बिंदु रखे गए हैं:
1. संवैधानिक प्रावधानों का उल्लंघन: मुस्लिम पर्सनल लॉ (शरीयत) एक्ट, 1937 की धारा 2 को संविधान के अनुच्छेद 14 (समानता), अनुच्छेद 15 (धर्म या लिंग के आधार पर भेदभाव का निषेध) और अनुच्छेद 21 (सम्मानपूर्वक और गरिमापूर्ण जीवन का अधिकार) का उल्लंघन करने वाला घोषित किया जाए.
2. लैंगिक समानता (Gender Equality): जब तक बहुविवाह और निकाह हलाला को BNS की धारा 82 के तहत दंडनीय अपराध नहीं बनाया जाता, तब तक मुस्लिम महिलाओं को वास्तविक समानता और सामाजिक सुरक्षा नहीं मिल सकती.
3. अनिवार्य विवाह पंजीकरण: देश में सभी मुस्लिम शादियों और तलाकों का अनिवार्य सरकारी पंजीकरण होना चाहिए, जिससे पति द्वारा पहली पत्नी की सहमति या जानकारी के बिना दूसरी शादी करने पर स्वतः कानूनी रोक लग सके.
4. वैवाहिक संपत्ति पर अधिकार: किसी भी अनधिकृत विवाह की स्थिति में वैवाहिक आवास और पारिवारिक संपत्ति पर पहला और स्थाई अधिकार पहली पत्नी और उसके बच्चों का सुनिश्चित किया जाए.
5. कानून का संहिताबद्धीकरण: सुप्रीम कोर्ट विधि आयोग (Law Commission of India) और केंद्र सरकार को निर्देश दे कि वह मुस्लिम पर्सनल लॉ को संहिताबद्ध करने का एक स्पष्ट मसौदा तैयार करे, ताकि विवाह, तलाक और उत्तराधिकार पूरी तरह आधुनिक संवैधानिक मूल्यों के अनुरूप हों.
अब तक क्या रहा रुख?
भारतीय न्यायपालिका ने समय-समय पर धर्म परिवर्तन और वैवाहिक अधिकारों के दुरुपयोग पर ऐतिहासिक टिप्पणियां और फैसले दिए हैं:
सुप्रीम कोर्ट ने समय-समय पर विवाह, धर्म परिवर्तन और वैवाहिक अधिकारों के दुरुपयोग से जुड़े मामलों में कई ऐतिहासिक फैसले दिए हैं. वर्ष 1995 के सरला मुद्गल बनाम भारत संघ मामले में शीर्ष अदालत ने स्पष्ट व्यवस्था दी थी कि पहली शादी को कानूनी रूप से समाप्त किए बिना केवल दूसरी शादी करने के उद्देश्य से इस्लाम अपनाना पूरी तरह अमान्य और गैरकानूनी है.
इसके बाद वर्ष 2000 के लिली थॉमस बनाम भारत संघ मामले में इस रुख को दोहराते हुए अदालत ने साफ किया कि फर्जी धर्म परिवर्तन के जरिए की गई दूसरी शादी शून्य मानी जाएगी और ऐसे व्यक्ति पर द्विविवाह (Bigamy) का आपराधिक मुकदमा चलेगा.
वहीं, वर्ष 2017 के ऐतिहासिक शायरा बानो बनाम भारत संघ मामले में 5 जजों की संविधान पीठ ने तुरंत तीन तलाक (तलाक-ए-बिद्दत) को महिलाओं के मूल अधिकारों के विरुद्ध और असंवैधानिक करार दिया, जिसके आधार पर संसद ने इसे संज्ञेय और दंडनीय अपराध घोषित करने वाला कानून पारित किया. हालांकि, 2017 के शायरा बानो मामले में सुप्रीम कोर्ट ने बहुविवाह और ‘निकाह हलाला’ पर कोई अंतिम आदेश पारित नहीं किया था और इसे भविष्य की समीक्षा के लिए खुला छोड़ दिया था.
वर्ष 2023 में तत्कालीन मुख्य न्यायाधीश डीवाई चंद्रचूड़, जस्टिस पीएस नरसिम्हा और जस्टिस जेबी पारदीवाला की पीठ ने स्पष्ट किया था कि इस संवेदनशील संवैधानिक मुद्दे पर सुनवाई के लिए 5 जजों की एक नई संविधान पीठ गठित की जाएगी. इसके बाद जस्टिस इंदिरा बनर्जी की अध्यक्षता वाली संविधान पीठ ने राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग (NHRC), राष्ट्रीय महिला आयोग (NCW) और राष्ट्रीय अल्पसंख्यक आयोग (NCM) को पक्षकार बनाकर उनसे विस्तृत जवाब तलब किया था.
याचिका में कठोर धाराओं की मांग
याचिकाकर्ताओं में शामिल वरिष्ठ अधिवक्ता अश्विनी उपाध्याय ने अपनी याचिका में निकाह हलाला और तीन तलाक से जुड़े सामाजिक आघातों को रेखांकित किया है. ‘निकाह हलाला’ की परंपरा के तहत यदि किसी मुस्लिम महिला को उसका पति तलाक दे देता है और बाद में दोनों दोबारा शादी करना चाहते हैं, तो महिला को पहले किसी अन्य पुरुष से निकाह करना पड़ता है, वैवाहिक संबंध स्थापित करने होते हैं और उस दूसरे पति द्वारा तलाक दिए जाने के बाद ही वह अपने पूर्व पति से पुनः निकाह कर सकती है.
याचिका में अदालत से यह घोषित करने की मांग की गई है कि:
– तीन तलाक महिलाओं के साथ शारीरिक व मानसिक क्रूरता है.
– निकाह हलाला की बाध्यकारी प्रथा वास्तव में जबरन स्थापित किए जाने वाले संबंधों की श्रेणी में आती है.
– पहली शादी के रहते बहुविवाह करना सामान्य आपराधिक कानून के तहत धोखाधड़ी और द्विविवाह का अपराध है.
याचिका में संविधान के अनुच्छेद 25 (धार्मिक स्वतंत्रता), अनुच्छेद 44 (समान नागरिक संहिता के नीति-निर्देशक तत्व) और संविधान की 7वीं अनुसूची की समवर्ती सूची की प्रविष्टि 5 (विवाह और तलाक पर संसद व विधानसभाओं का विधायी अधिकार) का हवाला देते हुए एकरूपता की मांग की गई है.
क्या बहुविवाह ‘अनिवार्य प्रथा’ है?
सुप्रीम कोर्ट के समक्ष सबसे अहम संवैधानिक परीक्षण यह होगा कि क्या बहुविवाह संविधान के अनुच्छेद 25 के तहत एक ‘अनिवार्य धार्मिक प्रथा’ मानी जा सकती है? न्यायिक सिद्धांतों के अनुसार, केवल वही परंपरा अनिवार्य धार्मिक प्रथा मानी जाती है, जिसे हटाने से उस धर्म का मूल स्वरूप या अस्तित्व ही समाप्त हो जाए. धार्मिक ग्रंथों और आधुनिक इस्लामी न्यायशास्त्र के जानकारों का तर्क है कि आम धारणा के विपरीत कुरान एक विवाह को ही आदर्श मानता है.
सूरह अन-निसा (4:3) का संदर्भ: कुरान की सूरह अन-निसा की आयत 3 में स्पष्ट निर्देश है कि यदि किसी पुरुष को यह भय हो कि वह एक से अधिक पत्नियों के बीच पूर्ण न्याय और निष्पक्षता नहीं बरत पाएगा, तो उसे केवल एक ही पत्नी से निकाह करना चाहिए.
ऐतिहासिक पृष्ठभूमि: 7वीं सदी में जब यह आयत अवतरित हुई, तब अरब समाज में पुरुषों की दर्जनों या सैकड़ों पत्नियां रखने की अनियंत्रित प्रथा थी. युद्धों में शहीद हुए सैनिकों के अनाथ बच्चों और बेसहारा विधवाओं को सामाजिक व वित्तीय सुरक्षा देने के उद्देश्य से चार शादियों की एक बेहद सीमित और सशर्त इजाजत दी गई थी, न कि इसे कोई अनिवार्य धार्मिक कर्तव्य बनाया गया था.
समानता की असंभव शर्त: कुरान यह भी कहता है कि पुरुषों के लिए सभी पत्नियों के बीच भावनात्मक और वित्तीय रूप से 100% समानता बनाए रखना व्यावहारिक रूप से असंभव है, इसलिए निष्कर्षतः एक पत्नी तक सीमित रहना ही श्रेयस्कर है.
दुनिया भर के मुस्लिम देशों में क्या हैं कानून?
भारत में बहुविवाह को लेकर जहां पर्सनल लॉ की दुहाई दी जाती है, वहीं दुनिया के कई प्रमुख मुस्लिम-बहुल देश इस प्रथा को या तो पूरी तरह गैरकानूनी घोषित कर चुके हैं या इस पर बेहद कड़े प्रशासनिक प्रतिबंध लगा चुके हैं:
1. तुर्किये (Turkey): तुर्किये ने 1926 के स्विस-आधारित नागरिक संहिता के माध्यम से बहुविवाह को पूरी तरह समाप्त कर दिया और केवल एकल विवाह (Monogamy) को कानूनी मान्यता दी.
2. ट्यूनीशिया (Tunisia): 1956 के कोड ऑफ पर्सनल स्टेटस के तहत ट्यूनीशिया ने बहुविवाह पर पूर्ण प्रतिबंध लगाया और इसे एक दंडनीय अपराध घोषित किया.
3. मिस्र (Egypt): मिस्र के कानूनों के तहत पति को दूसरी शादी करने से पहले पहली पत्नी को आधिकारिक नोटिस देना अनिवार्य है और पहली पत्नी को तत्काल तलाक और भारी मुआवजे की मांग करने का अधिकार प्राप्त है.
4. पाकिस्तान (Pakistan): मुस्लिम परिवार कानून अध्यादेश (MFLO), 1961 के तहत किसी भी पुरुष को दूसरी शादी करने से पहले मौजूदा पत्नी (या पत्नियों) की सहमति और स्थानीय आर्बिट्रेशन काउंसिल से लिखित अनुमति लेना अनिवार्य है. बिना अनुमति के विवाह करने पर जेल और जुर्माने का प्रावधान है.
सुप्रीम कोर्ट के समक्ष संभावित कानूनी विकल्प
संविधान पीठ जब इस मामले की विस्तृत सुनवाई करेगी, तो उसके सामने न्यायिक सुधार के दो प्रमुख रास्ते होंगे:
1. संवैधानिक निरस्तीकरण: सुप्रीम कोर्ट शरीयत एक्ट 1937 की धारा 2 के तहत बहुविवाह और निकाह हलाला को संविधान के अनुच्छेद 14, 15 और 21 के विरुद्ध पाते हुए असंवैधानिक घोषित कर दे और देश के सभी नागरिकों को भारतीय न्याय संहिता (BNS) की धारा 82 के एक समान दायरे में ले आए.
2. संसद को विधायी निर्देश: शीर्ष अदालत केंद्र सरकार को मुस्लिम महिला (विवाह अधिकार संरक्षण) कानून, 2019 की तर्ज पर एक नया, स्पष्ट और सख्त कानून बनाने का दिशानिर्देश जारी करे, जिससे बहुविवाह को अपराध के रूप में संहिताबद्ध किया जा सके.
सर्वोच्च अदालत की यह आगामी सुनवाई न केवल भारतीय मुस्लिम महिलाओं के मूल अधिकारों और सामाजिक सुरक्षा की दशा-दिशा तय करेगी, बल्कि स्वतंत्र भारत में पर्सनल लॉ बनाम संवैधानिक नैतिकता की सीमाओं को भी पुनर्परिभाषित करेगी.
Bureau Report
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