अभद्र भाषा से नहीं होगा किसी समस्‍या का समाधान, इस मामले में क्‍या कहता है प्रावधान?

अभद्र भाषा से नहीं होगा किसी समस्‍या का समाधान, इस मामले में क्‍या कहता है प्रावधान?

‘आज तो मन करता है बस आपसे ही बातें करूं… जंतर-मंतर पर जो कुछ भी हुआ, देश और दुनिया ने देखा है. कुछ शरारती बच्चों ने भद्दी-भद्दी गालियां बोलीं, जो किसी भी सभ्य समाज को शोभा नहीं देतीं. मुझे और मेरी दिवंगत माताजी को गालियां दी गईं, लेकिन बचपन में गलतियां होती हैं और गलतियों को सुधारने का अवसर भी होता है. ये बच्चे भी हमारे हैं, उन्हें रास्ता दिखाना हमारा काम है. मैं उन्हें माफ करना चाहता हूं.’ जंतर-मंतर पर नीट पेपर लीक के विरोध प्रदर्शन के दौरान अपने खिलाफ यूज की गई अभद्र भाषा पर इंस्‍टा की एक पोस्‍ट में युवाओं को संबोधित करते हुए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने ये भावुक शब्द कहे. इससे सवाल उठता है कि क्या किसी को गाली देना या गलत भाषा का इस्तेमाल करना कानूनी रूप से अपराध है? 

दरअसल, जब भी सार्वजनिक जगहों पर गाली-गलौज या गलत व्यवहार का मामला आता है, तो अक्सर BNS की धारा 296 (पुराने कानून की धारा 294) का यूज किया जाता है. आसान शब्दों में कहें तो अगर कोई व्यक्ति किसी सार्वजनिक जगह पर लोगों को परेशान करने की नीयत से कोई गंदी हरकत करता है या भद्दे शब्द यानी गाली देता है, तो उसे 3 महीने तक की जेल हो सकती है. आम तौर पर सड़क पर चिल्लाने या बदतमीजी करने पर यही धारा लगाई जाती है. हालांकि, अदालतों ने हमेशा यह साफ किया है कि कानून की नजर में ‘अश्लील’ शब्द का मतलब बहुत सीमित है और हर कड़वी बात या गाली इस धारा के तहत अपराध नहीं बन जाती.

अश्लीलता तय करने का पैमाना क्या है?

भारत में ‘अश्लीलता’ की कानूनी परिभाषा को पहली बार 1965 के ‘रणजीत डी. उदेशी बनाम महाराष्ट्र राज्य’ मामले में परखा गया था. यह मामला डी.एच. लॉरेंस के प्रसिद्ध उपन्यास ‘लेडी चैटर्लीज़ लवर’ पर लगे प्रतिबंध से जुड़ा था. इस फैसले में सुप्रीम कोर्ट ने किताब पर लगे बैन को सही ठहराया और अश्लील किताबों की बिक्री रोकने वाले कानून (IPC की धारा 292) को संवैधानिक रूप से वैध माना.

अदालत ने यह तय करने के लिए कि कोई चीज ‘अश्लील’ है या नहीं, एक पुराना नियम अपनाया था. इसे 1868 का अंग्रेजी कानून ‘हिकलिन टेस्ट’ कहा जाता है. इस नियम का मानना था कि अगर किसी किताब या रचना का छोटा-सा हिस्सा भी सबसे कमजोर दिमाग वाले पाठक को भटका या बिगाड़ सकता है, तो उसे अश्लील माना जाएगा. इसी नियम के आधार पर अदालत ने उस समय ‘लेडी चैटर्लीज़ लवर’ नाम की मशहूर किताब पर रोक लगा दी थी.

अंग्रेजी कानून तो बहुत पहले बदल गया था, लेकिन भारत की अदालतें काफी सालों तक पुराने नियमों पर ही चलती रहीं. साल 2006 में सुप्रीम कोर्ट ने आनंद पटवर्धन की डॉक्यूमेंट्री फिल्म वाले मामले में एक नया और बड़ा बदलाव किया. अदालत ने कहा कि किसी चीज को अश्लील तय करने के लिए उसके किसी एक छोटे-से सीन या हिस्से को अलग करके नहीं देखा जाना चाहिए, बल्कि पूरी फिल्म या किताब को एक सामान्य और स्वस्थ सोच वाले इंसान की नजर से देखना चाहिए.

अपशब्द या गाली देना अपराध कब नहीं?

साल 2024 में TVF (TVF) की वेब सीरीज ‘कॉलेज रोमांस’ के एक एपिसोड में ज्यादा गालियों के इस्तेमाल को लेकर कानूनी विवाद हो गया था और उस पर बैन लगाने की मांग की गई थी, लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में दर्ज एफआईआर (FIR) को रद्द करते हुए साफ किया कि हर अशिष्टता या गाली-गलौज कानूनी तौर पर ‘अश्लीलता’ नहीं होती.

सुप्रीम कोर्ट ने बेहद अहम टिप्पणी करते हुए कहा था, ‘भले ही इस्तेमाल किए गए शब्दों का शाब्दिक अर्थ यौन क्रियाओं से जुड़ा हो, लेकिन आम बोलचाल में इनका इस्तेमाल किसी दर्शक में कामुकता या यौन भावनाएं नहीं जगाता. इसके बजाय, ऐसे शब्द आम तौर पर इंसान के गुस्सा, आक्रोश, निराशा, दुख या उत्तेजना जैसी भावनाओं को व्यक्त करने के लिए बोले जाते हैं.’

2026 के दो बड़े फैसले: ‘गाली देना अश्लीलता नहीं’

साल 2026 में जस्टिस पी.एस. नरसिम्हा की बेंच ने आम लोगों से जुड़े दो मामलों में यही नियम लागू किया है.

शिवकुमार मामला (अप्रैल 2026): सुप्रीम कोर्ट ने बहस के दौरान किसी को “बास्टर्ड” (हरामी) कहने वाले व्यक्ति को बरी कर दिया. कोर्ट ने कहा कि गुस्से में ऐसा शब्द बोलना कानूनी तौर पर ‘अश्लीलता’ नहीं है.

मणि मामला (जुलाई 2026): इस मामले की सुनवाई में सुप्रीम कोर्ट ने साफ शब्दों में कहा, ‘कानून की नजर में गाली-गलौज या अपशब्द बोलना अश्लीलता नहीं है, चाहे इस्तेमाल किए गए शब्द कितने भी बुरे या असभ्य क्यों न हों. केवल गालियों को अश्लीलता नहीं माना जा सकता.’

इस मुद्दे पर कोर्ट के फैसलों में अक्सर यह कहा जाता है कि किसी बात को अश्लील माने जाने के लिए यह साबित करना जरूरी है कि वह कामुकता जगाने वाली थी.

सितंबर 2025 में तेलंगाना हाई कोर्ट ने साफ कहा था कि सोशल मीडिया पर किसी राजनीतिक दल को ‘कीड़ा-मकोड़ा’ या ‘आफत’ कहना भले ही भद्दी भाषा हो, लेकिन जब तक इससे इलाके में दंगा या शांति भंग होने का असली खतरा न हो, तब तक धारा 352 या 353 नहीं लगाई जा सकती. कोर्ट के अनुसार, यह ज्यादा से ज्यादा केवल मानहानि का मामला बन सकता है, जिस पर बोलने की आजादी (Article 19) का अधिकार लागू होता है.

कल्‍चरल शॉक का सवाल

कानूनी पहलू के अलावा इस मसले के सांस्‍कृतिक और नैतिक पक्ष भी हैं. पीएम मोदी ने भी बच्चियों की अशिष्‍ट भाषा को कल्‍चरल शॉक कहा. इसमें सवाल ये है कि भारत तो छोड़ो क्‍या किसी भी देश में इस तरह की भाषा शैली घर-परिवार और समाज में स्‍वीकार्य है? इसका जवाब है- नहीं. किसी भी देश में किसी भी समय में इस तरह की आपित्‍तजनक भाषा की स्‍वीकार्यता नहीं रही है. लिहाजा इस पूरे मामले में कानूनी पक्ष से भी बड़ा सवाल सांस्‍कृतिक पक्ष का है. सांस्‍कृतिक पक्ष के आधार पर ही किसी समाज का नैतिक पक्ष भी स्‍वरूप लेता है. लिहाजा भले ही पीएम मोदी ने शरारती बच्‍चों के सुधरने की अपेक्षा के साथ उनको माफ कर दिया लेकिन किसी भी सभ्‍य समाज में सार्वजनिक मंच पर अमर्यादित भाषा कल्‍चरल शॉक के दायरे में ही आती है.

Bureau Report

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