‘बस मोबाइल ही तो मांगा था’… छोटी बात कब बन जाती है जानलेवा? एक्सपर्ट ने बताए पेरेंट्स के लिए जरूरी संकेत

‘बस मोबाइल ही तो मांगा था’… छोटी बात कब बन जाती है जानलेवा? एक्सपर्ट ने बताए पेरेंट्स के लिए जरूरी संकेत

एक घर जब बनता है, तो उसमें दीवारों से ज़्यादा उम्मीदें और सपने होते हैं. माता-पिता दिन-रात एक करके अपने पसीने की कमाई से अपने बच्चों के हर छोटे-बड़े सपने को सींचते हैं. लेकिन क्या हो जब वही बच्चा, जिसे हाथ थामकर चलना सिखाया गया था, एक मोबाइल फोन की खातिर अपने पूरे परिवार को काल के गाल में धकेल दे?

महाराष्ट्र के छत्रपति संभाजीनगर (औरंगाबाद) स्थित गौताला वन्यजीव अभयारण्य की अंबा दरी घाटी में जो हुआ, उसने पूरे देश को झकझोर कर रख दिया है. 18 साल का कुणाल चांदगुडे चुपके से आईफोन खरीद तो लिया था, लेकिन उसकी किस्तें (ईएमआई) चुकाने के लिए उसे परिवार से पैसे मांगने पड़ रहे थे. इसी बात को लेकर उपजे विवाद में उसकी जिद इतनी बढ़ गई कि वह पहाड़ की चोटी पर जा खड़ा हुआ. गांव के पूर्व सरपंच संजय जाधव के अनुसार, उस वक्त जो मंजर वहां था, वह किसी भी इंसान का कलेजा चीरने के लिए काफी था. मां-बाप रो रहे थे, हाथ जोड़ रहे थे, अपने कलेजे के टुकड़े के सामने गिड़गिड़ा रहे थे कि ‘बेटा नीचे उतर आओ.’ लेकिन डिजिटल दुनिया के भंवर में फंसे बेटे पर खून सवार था.

जब कुणाल ने नीचे कूदने की कोशिश की, तो उसे रोकने के लिए पिता मुरलीधर चांदगुडे ने चट्टान से उसे पीछे खींचने का प्रयास किया. लेकिन संतुलन बिगड़ने के कारण पिता और बेटा दोनों ही सैकड़ों फीट गहरी घाटी में जा गिरे और मौके पर ही उनकी मौत हो गई. अपनी आंखों के सामने पति और इकलौते बेटे को यूं खत्म होते देख मां संगीता चांदगुडे भी अपना आपा खो बैठीं और उन्होंने भी उसी घाटी में छलांग लगाकर अपनी जान दे दी.

एक आईफ़ोन और उसकी किस्तों के चक्कर में एक हंसता-खेलता परिवार चंद सेकंडों में खत्म हो गया. यह सिर्फ एक हादसा नहीं है, यह हमारे समाज, हमारी पेरेंटिंग और आज के युवाओं के मानसिक स्वास्थ्य पर लगा एक बहुत बड़ा प्रश्नचिह्न है.

इसी विषय पर मैक्स हॉस्पिटल के प्रिंसिपल कंसलटेंट साइकियाट्रिस्ट और ‘द हीलर्स साइकियाट्री सेंटर’ के फाउंडर व चेयरमैन डॉ. पंकज कुमार ने इस पूरी समस्या का आसान में बताया. आइए समझते हैं कि डिजिटल दौर में हमारे बच्चों के मन में क्या चल रहा है और इस तरह के हादसों को कैसे रोका जा सकता है.

1. टीनएजर्स की वे परेशानियां जो माता-पिता को छोटी लगती हैं, लेकिन बच्चों के लिए पहाड़ होती हैं?

डॉ. पंकज कुमार के अनुसार, आज के दौर में बच्चों का मिजाज (Temperament) और व्यक्तित्व बहुत तेज़ी से बदल रहा है. आज के टीनएजर्स को हम पुराने ज़माने के पैमाने से नहीं माप सकते. इसके पीछे मुख्य रूप से तीन बड़े कारण हैं:

हर उम्र का अलग मिज़ाज: छोटे बच्चे, किशोरावस्था (Adolescence) और टीनएजर्स इन सभी की मानसिक ज़रूरतें अलग होती हैं. टीनएजर्स की तुलना आप छोटे बच्चों या वयस्कों से नहीं कर सकते.

सूचनाओं का ओवरलोड (Information Overload): आज बच्चों के पास इंटरनेट और सोशल मीडिया के ज़रिए इतनी ज़्यादा जानकारी (Information) बहुत तेज़ी से आ रही है कि उनका दिमाग उसे सही तरीके से प्रोसेस ही नहीं कर पा रहा है. इस ओवरलोड की वजह से उनके विचार, हाव-भाव और व्यवहार में बहुत तेज़ी से बदलाव आ रहा है.

वो बताते है कि वह दौर चला गया जब बच्चों को डांटकर, मारकर या डराकर सही रास्ते पर लाया जा सकता था. आज अगर माता-पिता सख्ती करेंगे, तो बच्चा सुधरने के बजाय बदला लेने (Retaliate) की सोच रखने लगेगा. उसके मन में माता-पिता के प्रति कड़वाहट और गुस्सा भरेगा, जिससे रिश्ते बदतर होते चले जाएंगे.

2. बच्चों के व्यवहार में दिखने वाले वार्निंग साइंस (Warning Signs): कब सतर्क हों?

आज के टीनएजर्स पर कई तरह के छिपे हुए दबाव होते हैं. जैसे दोस्तों से ब्रेकअप होना, सोशल मीडिया पर सुंदर दिखने का दबाव (Body Appearance), ऑनलाइन ट्रोलिंग और बुलिंग (Bullying). इन वजहों से उन्हें अपनी पहचान और आत्म-सम्मान (Self-worth) पर खतरा महसूस होने लगता है.

3. माता-पिता को बच्चे के व्यवहार में दिखने वाले इन बदलावों पर तुरंत ध्यान देना चाहिए:

अचानक और बड़ा बदलाव… अगर बच्चा अचानक बहुत ज़्यादा गुस्सा करने लगे या उसकी नींद एकदम गायब हो जाए.

डेली रूटीन का प्रभावित होना- बच्चे की पढ़ाई के ग्राफ में अचानक भारी गिरावट आना, उसका दोस्तों और परिवार से कट जाना और अत्यधिक चिड़चिड़ा हो जाना.

आत्मघाती विचार- अगर बच्चा निराशा (Hopelessness) की बातें करे, खुद को नुकसान पहुंचाने (Self-harm) की बात कहे, या इंटरनेट पर ‘How to die’ या ‘हाउ टू फिनिश माई लाइफ’ जैसी चीज़ें सर्च कर रहा हो. इसे ‘उम्र का असर’ या ‘बचपना’ कहकर टालना बहुत भारी पड़ सकता है.

4. बच्चा इंटरनेट से पूरी तरह कट जाए या गुमसुम हो जाए तो क्या करें?

आजकल के बच्चे अपने कमरे में अकेले रहना और सीक्रेटली ऑनलाइन काम करना पसंद करते हैं. यह एक सामान्य ट्रेंड है. लेकिन अगर बच्चा अचानक सोशल मीडिया, दोस्तों और परिवार से बिल्कुल अलग-थलग (Isolate) पड़ जाए, तो यह डिप्रेशन या इमोशनल डिस्ट्रेस का संकेत हो सकता है.

जांचें और समझें- हमें देखना होगा कि यह समस्या कितने समय (Duration) से चल रही है और बच्चे की पढ़ाई व खेल-कूद पर इसका कितना असर (Impact) पड़ा है.

इलाज की जरूरत- हर मामले में केवल डांटना या समझाना काफी नहीं होता. बच्चे की स्थिति के आधार पर यह तय किया जाता है कि उसे काउंसलिंग की ज़रूरत है, दवाइयों की, या फिर केवल पेरेंट्स के सहयोग की.

5. छोटी-छोटी बातों पर अत्यधिक गुस्सा और अकेलापन: क्या है इसका समाधान?

टीनएज में मूड स्विंग्स (Mood Swings) होना बहुत स्वाभाविक है. हर मूड स्विंग को मेंटल डिसऑर्डर या बीमारी नहीं माना जा सकता. आमतौर पर ये गुस्सा या नखरे कुछ समय (Short-lived) के लिए होते हैं और फिर ठीक हो जाते हैं.

लेकिन संभाजीनगर जैसी घटना में, जहां एक मोबाइल के लिए पूरे परिवार की जान चली गई, यह दिखाता है कि बच्चे के लिए वह चीज उसकी जान से भी ज़्यादा कीमती बन गई थी.

एक छड़ी से सबको न हांकें: हर बच्चा यूनिक (Unique) और बेहद संवेदनशील होता है.

डॉ. पंकज कुमार बताते है कि किसी भी गैजेट या मोबाइल की कीमत इंसानी जान से बड़ी नहीं हो सकती. इसलिए बच्चे की किसी ज़िद या व्यवहार को हल्के में न लें और उसे बहुत ही संवेदनशीलता के साथ हैंडल करें.

6. बच्चों की ऑनलाइन दुनिया में दखल दिए बिना उनकी सुरक्षा कैसे करें?

डॉ. पंकज कुमार बताते हैं कि इंसान के दिमाग का अगला हिस्सा (Pre-frontal Cortex), जो सही और गलत का फैसला लेने और परिपक्वता (Maturity) के लिए ज़िम्मेदार होता है, वह 24-25 साल की उम्र में जाकर पूरी तरह विकसित होता है. टीनएज में बच्चे इमोशनली बहुत नाजुक होते हैं और उनके पास सही-गलत को आंकने की क्षमता नहीं होती.

डिजिटल हाइजीन (Digital Hygiene): जैसे बच्चों को अच्छी आदतों की शिक्षा दी जाती है, वैसे ही उन्हें ‘इंटरनेट एजुकेशन’ देना ज़रूरी है. उन्हें ऑनलाइन स्कैमर्स, अश्लील कंटेंट और साइबर बुलिंग के खतरों से आगाह करें.

पुलिस नहीं, दोस्त बनें: माता-पिता को बच्चे के साथ ऐसा रिश्ता बनाना होगा कि बच्चा बिना किसी डर या झिझक के अपनी परेशानी बता सके. अगर आप जजमेंटल बनेंगे और बात-बात पर डांटेंगे, तो बच्चा अपने मन के दरवाज़े बंद कर लेगा.

7. रोजाना 10-15 मिनट की बातचीत में मानसिक परेशानी को कैसे पहचानें?

पेरेंटिंग का पहला नियम है… इंटीग्रेशन नहीं, कनेक्शन (Connection, Not Integration). माता-पिता को घर में पुलिस या जज बनने की ज़रूरत नहीं है.

सुने और समझें: बच्चा खुलकर अपनी परेशानी न भी कहे, तो उसके खाने-पीने, सोने, पढ़ाई और व्यवहार में आ रहे अचानक बदलावों को नोट करें. पहले सुनें, फिर समाधान दें: बच्चे पर अपना फैसला थोपने के बजाय, पहले उसकी बात को ध्यान से सुनें और उसके स्तर पर जाकर समस्या का हल निकालें.

7. एक्सपर्ट या साइकोलॉजिस्ट के पास कब जाना चाहिए?

हमारे समाज में सबसे बड़ी त्रासदी यह है कि मानसिक बीमारी को आज भी ‘पागलों की बीमारी’ माना जाता है और साइकियाट्रिस्ट के पास जाने में लोग झिझकते हैं. फिल्मों और मीडिया ने भी मनोचिकित्सा का काफी गलत चित्रण किया है, जिससे लोगों में भ्रांतियां फैली हैं.

इंतजार न करें अगर

बच्चा सुसाइडल थ्रेट्स (आत्महत्या की धमकी) दे रहा हो.

उसकी नींद और खाना-पीना पूरी तरह से छूट चुका हो.

उसके ग्रेड्स बहुत तेज़ी से गिर रहे हों और वह बिल्कुल चुप रहने लगा हो.

ऐसी स्थिति में किसी एक्सपर्ट, साइकोलॉजिस्ट या साइकियाट्रिस्ट की मदद लेने में ज़रा भी देरी न करें. बच्चों की दवाइयां पूरी तरह से सुरक्षित होती हैं और सही समय पर लिया गया डॉक्टरी परामर्श एक अनमोल जान बचा सकता है.

ऐसी ही 4 अन्य दर्दनाक घटनाएं: जब मोबाइल की जिद और लत ने ली मासूमों की जान

संभाजीनगर की यह घटना कोई इकलौती घटना नहीं है. देश के अलग-अलग हिस्सों से ऐसी कई डराने वाली खबरें सामने आ चुकी हैं, जहां फोन छीनने या न दिलाने पर बच्चों ने खौफनाक कदम उठा लिए:

हुब्बल्ली, कर्नाटक (अप्रैल 2026)

आठवीं कक्षा में पढ़ने वाले 13-वर्षीय छात्र समर्थ को मोबाइल गेमिंग की बहुत बुरी लत लग चुकी थी. जब उसकी मां ने पढ़ाई के लिए उससे मोबाइल फोन छीन लिया, तो बच्चे ने गुस्से और डिप्रेशन में आकर अपने कमरे को अंदर से बंद किया और फांसी लगा ली. 

नांदेड़, महाराष्ट्र (जनवरी 2025)

 मीनाकी गांव में एक 17 वर्षीय युवक स्मार्टफोन खरीदने की जिद पर अड़ा था. घर की आर्थिक स्थिति ठीक न होने के कारण पिता फोन नहीं दिला पा रहे थे. लगातार होते क्लेश और मानसिक तनाव के कारण अंततः बेटे और पिता दोनों ने आत्मघाती कदम उठाकर अपनी जान दे दी. 

बीदर, कर्नाटक (मार्च 2025)

 15-वर्षीय एक किशोरी दिन-रात मोबाइल फोन और सोशल मीडिया पर व्यस्त रहती थी. जब पिता ने उसे अत्यधिक मोबाइल इस्तेमाल करने पर डांट दिया और फोन जमा कर लिया, तो किशोरी ने घर में ही खौफनाक कदम उठाकर आत्महत्या कर ली. 

मालवाणी (मुंबई), महाराष्ट्र (नवंबर 2023)

16-वर्षीय किशोर लगातार अपने फोन पर ऑनलाइन गेम खेल रहा था. देर रात तक गेम खेलते देख जब पिता ने उसे डांटा, फोन छीनकर रख दिया और सोने को कहा, तो सुबह कमरे में उस किशोर का शव फंदे से लटका मिला. 

Bureau Report

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